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नर्मदाष्टकम् PDF

नर्मदाष्टकम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं द्विषत्सु पापजातजातकारिवारिसंयुतम्। कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारि वर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Sabindu-sindhu-suskhalat-taranga-bhanga-ranjitam Dvisatsu papa-jata-jata-kari-vari-samyutam Kritanta-duta-kala-bhuta-bhiti-hari varmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जो असंख्य बिन्दुओं के सिन्धु-समान जल की लहरों एवं तरंग-भंगों से सुशोभित हैं, जिनका जल द्वेष करने वालों के पापों का नाश करता है, जो यमदूतों और काल के भय को हरने वाली तथा रक्षाकवच प्रदान करने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसम्प्रदायकं कलौ मलौघभारहारि सर्वतीर्थनायकम्। सुमत्स्यकच्छनक्रचक्रवाकशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Tvad-ambu-lina-dina-mina-divya-sampradayakam Kalau malaugha-bhara-hari sarva-tirtha-nayakam Su-matsya-kachha-nakra-chakra-vaka-sharmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जो अपने जल में रहने वाली दीन मछलियों को भी दिव्य आश्रय देती हैं, जो कलियुग में पापों के समूह के भार को हरने वाली, समस्त तीर्थों की नायिका, तथा मत्स्य, कच्छप, मगर और चक्रवाक पक्षियों को सुख देने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

महागभीरनीरपूरपापधूतभूतलं ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम्। जगल्लये महाभये मृकण्डुसूनुहर्म्यदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Maha-gabhira-nira-pura-papa-dhuta-bhutalam Dhvanat-samasta-pataka-ri-darit-apad-achalam Jagallaye maha-bhaye mrikandu-sunu-harmyade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जिनके अति गम्भीर जल-प्रवाह से समस्त भूतल के पाप धुल जाते हैं, जिनकी ध्वनि समस्त पापियों की विपत्ति-रूपी पर्वतों को विदीर्ण कर देती है, जो महाप्रलय के महाभय में मार्कण्डेय के लिए आश्रय-भवन बनीं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा मृकण्डुसूनुशौनकासुरारिसेविसर्वदा। पुनर्भवाब्धिजन्मजं भवाब्धिदुःखवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Gatam tadaiva me bhayam tvad-ambu vikshitam yada Mrikandu-sunu-shaunaka-surari-sevi-sarvada Punar-bhavabdhi-janmajam bhavabdhi-duhkha-varmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जब आपके जल का दर्शन हुआ, उसी क्षण मेरा भय जाता रहा; जो मार्कण्डेय, शौनक और देवशत्रुओं द्वारा भी सदा सेवित हैं, तथा पुनर्जन्म के संसार-सागर के दुःखों से रक्षाकवच देने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

अलक्षलक्षकिन्नरामरासुरादिपूजितं सुलक्षनीरतीरधीरपक्षिलक्षकूजितम्। वसिष्ठसिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Alakshya-laksha-kinnar-amar-asur-adi-pujitam Su-laksha-nira-tira-dhira-pakshi-laksha-kujitam Vasishtha-sishta-pippal-adi-kardam-adi-sharmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जो किन्नरों, देवों, असुरों आदि से पूजित हैं, जिनके सुन्दर तटों पर असंख्य धीर पक्षी कूजते हैं, जो वसिष्ठ, शिष्ट जनों, पिप्पलाद, कर्दम आदि ऋषियों को कल्याण देने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

सनत्कुमारनाचिकेतकश्यपादिषट्पदैः धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः। रवीन्द्ररन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Sanat-kumara-nachiketa-kashyap-adi-shatpadaih Dhritam svakiya-manaseshu narad-adi-shatpadaih Ravindra-rantideva-deva-raja-karma-sharmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! सनत्कुमार, नचिकेता, कश्यप आदि ने तथा नारद आदि ने भ्रमरों के समान आपको अपने मन में धारण किया है; जो सूर्य, चन्द्र, रन्तिदेव और देवराज इन्द्र के कर्मों का फल देने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुधं ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम्। विरञ्चिविष्णुशङ्करस्वकीयधामवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Alaksha-laksha-laksha-papa-laksha-sara-sayudham Tatastu jiva-jantu-tantu-bhukti-mukti-dayakam Viranchi-vishnu-shankara-svakiya-dhama-varmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! जो जीवों के असंख्य पापों को नष्ट करने वाले मानो असंख्य कमल-बाणों से सुसज्जित हैं, जो संसार-सूत्र में बँधे समस्त जीव-जन्तुओं को भुक्ति और मुक्ति देने वाली हैं, तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को उनके अपने धामों का कवच देती हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

अहोऽमृतं स्वनं श्रुतं महेशकेशजात्तटे किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे। दुरन्तपापतापहारि सर्वजन्तुशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

Aho-amritam svanam shrutam mahesha-kesha-jat-tate Kirata-suta-vadaveshu pandite shathe nate Duranta-papa-tapa-hari sarva-jantu-sharmade Tvadiya-pada-pankajam namami devi narmade

हे देवी नर्मदे! अहो! महेश की जटाओं से उतरते हुए आपके तट पर आपकी अमृतमयी मधुर ध्वनि सुनाई देती है; जो किरात, सूत, वाडव, पण्डित, दुष्ट और नट — सभी के अनन्त पाप-ताप को हरकर समस्त प्राणियों को सुख देने वाली हैं — आपके चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।

इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा। सुलभ्यदेहदुर्लभं महेशधामगौरवं पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम्॥

Idam tu narmadashtakam tri-kalam eva ye sada Pathanti te nirantaram na yanti durgatim kada Sulabhya-deha-durlabham mahesha-dhama-gauravam Punar-bhava nara na vai vilokayanti rauravam

जो मनुष्य इस नर्मदाष्टक का तीनों कालों में सदा पाठ करते हैं, वे कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होते; मनुष्य-देह में भी अति दुर्लभ महेश-धाम की गरिमा को प्राप्त कर, वे पुनर्जन्म नहीं लेते और न ही कभी रौरव नरक को देखते हैं।