Mantra.Tips

परोपदेशे पाण्डित्यम् PDF

परोपदेशे पाण्डित्यम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम्। धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः॥

paropadeśe pāṇḍityaṁ sarveṣāṁ sukaraṁ nṛṇām। dharme svīyam anuṣṭhānaṁ kasyacit tu mahātmanaḥ॥

दूसरों को उपदेश देने में पाण्डित्य दिखाना सभी मनुष्यों के लिए सरल है; परन्तु धर्म का स्वयं आचरण करना किसी विरले महात्मा के लिए ही सम्भव होता है। यह श्लोक मृदु व्यंग्य से उपदेश देने और आचरण करने के बीच के अन्तर को उजागर करता है और स्मरण कराता है कि वाणी में दिखाई गई बुद्धि सामान्य है, जबकि कर्म में जी गई बुद्धि दुर्लभ है।