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प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः PDF

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प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति॥

prārabhyate na khalu vighna-bhayena nīcaiḥ prārabhya vighna-vihatā viramanti madhyāḥ। vighnaiḥ punaḥ punar api pratihanyamānāḥ prārabdham uttama-janā na parityajanti॥

नीच (निम्न श्रेणी के) लोग विघ्नों के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम (साधारण) लोग कार्य आरम्भ तो करते हैं, किन्तु विघ्न आते ही रुक जाते हैं। परन्तु उत्तम (श्रेष्ठ) जन, बार-बार विघ्नों से आहत होने पर भी, आरम्भ किए हुए कार्य को कभी नहीं छोड़ते। यह श्लोक सभी मनुष्यों को तीन श्रेणियों में बाँटकर सच्चे महापुरुषों की अटूट दृढ़ता की प्रशंसा करता है।