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पुनर्वित्तं पुनर्मित्रम् PDF

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पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥

punar vittaṁ punar mitraṁ punar bhāryā punar mahī। etat sarvaṁ punar labhyaṁ na śarīraṁ punaḥ punaḥ॥

धन पुनः प्राप्त किया जा सकता है, मित्र पुनः मिल सकता है, पत्नी और भूमि भी पुनः प्राप्त हो सकती है — यह सब पुनः प्राप्य है; परन्तु यह शरीर बार-बार प्राप्त नहीं होता। अतः मनुष्य-जीवन का यह दुर्लभ अवसर व्यर्थ नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सहज ही पुनः नहीं मिलता।