राहुकवचम् PDF
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ अस्य श्रीराहुकवचस्तोत्रमन्त्रस्य चन्द्रमा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, रां बीजम्, नमः शक्तिः, स्वाहा कीलकम्, राहुकृत पीडानिवारणार्थे, धनधान्य आयुरारोग्य आदि समृद्धि प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः ॥
|| śrīgaṇeśāya namaḥ || oṃ asya śrīrāhukavacastotramantrasya candramā ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, rāṃ bījam, namaḥ śaktiḥ, svāhā kīlakam, rāhukṛta pīḍānivāraṇārthe, dhanadhānya āyurārogya ādi samṛddhi prāptyarthe jape viniyogaḥ ||
श्रीगणेश को नमस्कार। ॐ। इस राहुकवच स्तोत्र मन्त्र के ऋषि चन्द्रमा हैं, छन्द अनुष्टुप् है, 'रां' बीज है, 'नमः' शक्ति है, 'स्वाहा' कीलक है; राहु के द्वारा उत्पन्न पीड़ा के निवारण तथा धन, धान्य, आयु, आरोग्य आदि समृद्धि की प्राप्ति हेतु इसका जप किया जाता है।
प्रणमामि सदा राहुं शूर्पाकारं किरीटिनम् । सैंहिकेयं करालास्यं लोकानामभयप्रदम् ॥ १॥
praṇamāmi sadā rāhuṃ śūrpākāraṃ kirīṭinam | saiṃhikeyaṃ karālāsyaṃ lokānāmabhayapradam || 1||
मैं सदा राहु को प्रणाम करता हूँ — जो शूर्प (सूप) के आकार वाले, किरीटधारी, सिंहिका के पुत्र, कराल मुख वाले, तथा लोकों को अभयदान देने वाले हैं।
नीलाम्बरः शिरः पातु ललाटं लोकवन्दितः । चक्षुषी पातु मे राहुः श्रोत्रे त्वर्धशरीरवान् ॥ २॥
nīlāmbaraḥ śiraḥ pātu lalāṭaṃ lokavanditaḥ | cakṣuṣī pātu me rāhuḥ śrotre tvardhaśarīravān || 2||
नीलाम्बर मेरे शिर की रक्षा करें, लोकवन्दित ललाट की; राहु मेरे नेत्रों की रक्षा करें, अर्धशरीरधारी कानों की।
नासिकां मे धूम्रवर्णः शूलपाणिर्मुखं मम । जिह्वां मे सिंहिकासूनुः कण्ठं मे कठिनाङ्घ्रिकः ॥ ३॥
nāsikāṃ me dhūmravarṇaḥ śūlapāṇirmukhaṃ mama | jihvāṃ me siṃhikāsūnuḥ kaṇṭhaṃ me kaṭhināṅghrikaḥ || 3||
धूम्रवर्ण मेरी नासिका की रक्षा करें, शूलपाणि मेरे मुख की; सिंहिकासूनु मेरी जिह्वा की रक्षा करें, कठिनाङ्घ्रिक मेरे कण्ठ की।
भुजङ्गेशो भुजौ पातु नीलमाल्याम्बरः करौ । पातु वक्षःस्थलं मन्त्री पातु कुक्षिं विधुन्तुदः ॥ ४॥
bhujaṅgeśo bhujau pātu nīlamālyāmbaraḥ karau | pātu vakṣaḥsthalaṃ mantrī pātu kukṣiṃ vidhuntudaḥ || 4||
भुजङ्गेश मेरी भुजाओं की रक्षा करें, नीलमाल्याम्बर हाथों की; मन्त्री मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें, विधुन्तुद कुक्षि की।
कटिं मे विकटः पातु ऊरू मे सुरपूजितः । स्वर्भानुर्जानुनी पातु जङ्घे मे पातु जाड्यहा ॥ ५॥
kaṭiṃ me vikaṭaḥ pātu ūrū me surapūjitaḥ | svarbhānurjānunī pātu jaṅghe me pātu jāḍyahā || 5||
विकट मेरी कटि की रक्षा करें, सुरपूजित ऊरुओं की; स्वर्भानु मेरे जानुओं की रक्षा करें, जाड्यहा मेरी जङ्घाओं की।
गुल्फौ ग्रहपतिः पातु पादौ मे भीषणाकृतिः । सर्वाण्यङ्गानि मे पातु नीलचन्दनभूषणः ॥ ६॥
gulphau grahapatiḥ pātu pādau me bhīṣaṇākṛtiḥ | sarvāṇyaṅgāni me pātu nīlacandanabhūṣaṇaḥ || 6||
ग्रहपति मेरे गुल्फों की रक्षा करें, भीषणाकृति मेरे पादों की; नीलचन्दनभूषण मेरे समस्त अङ्गों की रक्षा करें।
राहोरिदं कवचमृद्धिदवस्तुदं यो भक्त्या पठत्यनुदिनं नियतः शुचिः सन् । प्राप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिमायु- रारोग्यमात्मविजयं च हि तत्प्रसादात् ॥ ७॥
rāhoridaṃ kavacamṛddhidavastudaṃ yo bhaktyā paṭhatyanudinaṃ niyataḥ śuciḥ san | prāpnoti kīrtimatulāṃ śriyamṛddhimāyu- rārogyamātmavijayaṃ ca hi tatprasādāt || 7||
जो भक्तियुक्त, नियमी एवं पवित्र होकर राहु के इस समृद्धिप्रद कवच का प्रतिदिन पाठ करता है, वह उनके प्रसाद से अतुल कीर्ति, श्री, ऋद्धि, आयु, आरोग्य एवं आत्मविजय प्राप्त करता है।
॥ इति श्रीमहाभारते धृतराष्ट्रसञ्जयसंवादे द्रोणपर्वणि राहुकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrīmahābhārate dhṛtarāṣṭrasañjayasaṃvāde droṇaparvaṇi rāhukavacaṃ sampūrṇam ||
इस प्रकार महाभारत के द्रोणपर्व में धृतराष्ट्र-सञ्जय संवाद के अन्तर्गत राहुकवच सम्पूर्ण हुआ।