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स च वैश्यस्तपस्तेपे PDF

स च वैश्यस्तपस्तेपे की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

मार्कण्डेय उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः । प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं संशितव्रतम् ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā surathaḥ sa narādhipaḥ praṇipatya mahābhāgaṃ tamṛṣiṃ saṃśitavratam

मार्कण्डेय बोले — मुनि के ये वचन सुनकर वह नरेश सुरथ, दृढ़व्रती उन महाभाग ऋषि को प्रणाम करके — अत्यधिक ममता और राज्य के अपहरण से विरक्त होकर — तुरन्त तपस्या के लिए चल पड़े; और हे महामुने! वह वैश्य भी अम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर जा बैठा।

निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च । जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने ॥

nirviṇṇo'timamatvena rājyāpaharaṇena ca jagāma sadyastapase sa ca vaiśyo mahāmune

और वह वैश्य परम देवी-सूक्त का जप करते हुए तपस्या करने लगा। उन दोनों ने उस तट पर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर, पुष्प, धूप, अग्नि (हवन) और तर्पण से उनकी पूजा की; निराहार रहकर, संयमी होकर, उन्हीं में मन लगाए, एकाग्रचित्त होकर, उन दोनों ने अपने ही शरीर के रक्त से सिंचित बलि भी अर्पित की — इस प्रकार उन संयमी जनों ने तीन वर्षों तक उनकी आराधना की।

सन्दर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनमास्थितः । स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् ॥

sandarśanārthamambāyā nadīpulinamāsthitaḥ sa ca vaiśyastapastepe devīsūktaṃ paraṃ japan

तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् । अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः ॥

tau tasmin puline devyāḥ kṛtvā mūrtiṃ mahīmayīm arhaṇāṃ cakratustasyāḥ puṣpadhūpāgnitarpaṇaiḥ

निराहारौ यतात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ । ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् ॥

nirāhārau yatātmānau tanmanaskau samāhitau dadatustau baliṃ caiva nijagātrāsṛgukṣitam

एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥

evaṃ samārādhayatostribhirvarṣairyatātmanoḥ