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स वै पुंसां परो धर्मो PDF

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स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥

Sa vai puṃsāṃ paro dharmo yato bhaktir adhokṣaje. ahaituky apratihatā yayātmā suprasīdati.

समस्त मनुष्यों के लिए वही परम धर्म है जिससे अधोक्षज (इन्द्रियातीत परम भगवान) के प्रति भक्ति प्राप्त होती है। ऐसी भक्ति निष्काम (अहैतुकी) और अबाधित (अप्रतिहता) होनी चाहिए, क्योंकि उसी से आत्मा पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है।