संज्ञान सूक्तम् (सङ्गच्छध्वम्) PDF
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ॐ सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
Om Saṁ gacchadhvaṁ saṁ vadadhvaṁ saṁ vo manāṁsi jānatām Devā bhāgaṁ yathā pūrve saṁjānānā upāsate
तुम साथ-साथ चलो, एक स्वर में बोलो, तुम्हारे मन एक जैसे (एकमत) हों — जैसे प्राचीन देवता एकमत होकर अपने यज्ञ-भाग का सेवन करते थे।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥
Samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittam eṣām Samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi
तुम्हारा मन्त्र (विचार) समान हो, सभा समान हो, मन समान हो और सबके चित्त एक साथ हों। मैं तुम्हारे लिए समान मन्त्र का उच्चारण करता हूँ और समान हवि से तुम सबके लिए हवन करता हूँ।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
Samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ Samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati
तुम्हारी आकांक्षा (संकल्प) समान हो, तुम्हारे हृदय समान हों, तुम्हारा मन समान हो, जिससे तुम सब में पूर्ण एकता बनी रहे।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Śāntiḥ Śāntiḥ Śāntiḥ