सान्द्रानन्दावबोधात्मकम् (नारायणीयम् आरम्भ) — Complete Lyrics
सान्द्रानन्दावबोधात्मकम् (नारायणीयम् आरम्भ)
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
सान्द्रानन्दावबोधात्मकमनुपमितं कालदेशावधिभ्यां
निर्मुक्तं नित्यमुक्तं निगमशतसहस्रेण निर्भास्यमानम् ।
अस्पष्टं दृष्टमात्रे पुनरुरुपुरुषार्थात्मकं ब्रह्म तत्त्वं
तत्तावद्भाति साक्षाद्गुरुपवनपुरे हन्त भाग्यं जनानाम् ॥
Sāndrānandāvabodhātmakamanupamitaṁ kāladeśāvadhibhyāṁ
Nirmuktaṁ nityamuktaṁ nigamaśatasahasreṇa nirbhāsyamānam |
Aspaṣṭaṁ dṛṣṭamātre punarurupuruṣārthātmakaṁ brahma tattvaṁ
Tattāvadbhāti sākṣādgurupavanapure hanta bhāgyaṁ janānām ||
वह ब्रह्म-तत्त्व, जो सान्द्र आनन्द और शुद्ध बोध स्वरूप है, अनुपम है, काल और देश की सीमाओं से मुक्त है, नित्यमुक्त है, सहस्रों वेद-वाक्यों से प्रकाशित है — जो साधारण दृष्टि से अस्पष्ट किन्तु साक्षात् अनुभवगम्य है, तथा परम पुरुषार्थ का स्वरूप है — वही तत्त्व यहाँ गुरुवायुपुर में प्रत्यक्ष विराजमान है। अहो, यह जनों का कितना सौभाग्य है!
Verse 2
एवं दुर्लभ्यवस्तुन्यपि सुलभतया हस्तलब्धे यदन्यत्
तन्वा वाचा धिया वा भजति बत जनः क्षुद्रतां क्षुद्रबुद्धिः ।
एषोऽहं विश्वमूर्ते तव चरणयुगं देवपूज्यं प्रपद्ये
हन्त वासुदेव क्षपय दुरितं द्रागयो माममुं ते ॥
Evaṁ durlabhyavastunyapi sulabhatayā hastalabdhe yadanyat
Tanvā vācā dhiyā vā bhajati bata janaḥ kṣudratāṁ kṣudrabuddhiḥ |
Eṣo'haṁ viśvamūrte tava caraṇayugaṁ devapūjyaṁ prapadye
Hanta vāsudeva kṣapaya duritaṁ drāgayo māmamuṁ te ||
ऐसी दुर्लभ वस्तु सुलभता से हाथ में आ जाने पर भी, हाय, क्षुद्रबुद्धि मनुष्य शरीर, वाणी और मन से तुच्छ वस्तुओं को ही भजता है। हे विश्वमूर्ते! देवों से पूज्य आपके दोनों चरणों की मैं शरण लेता हूँ। हे वासुदेव! शीघ्र ही मेरे — इस शरणागत के — समस्त दुरित को नष्ट कर दीजिए।
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