श्री शिव कवचम् — Complete Lyrics
श्री शिव कवचम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
ध्यानम्
वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठमरिन्दमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शम्भुमुमापतिम् ॥
dhyānam
vajradaṃṣṭraṃ trinayanaṃ kālakaṇṭhamarindamam |
sahasrakaramatyugraṃ vande śambhumumāpatim ||
ध्यान: वज्र के समान दाढ़ों वाले, त्रिनेत्रधारी, नीलकण्ठ, शत्रुओं का दमन करने वाले, सहस्रबाहु, अत्यन्त उग्र — उमापति शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ।
Verse 2
ॐ अस्य श्रीशिवकवचस्तोत्रमन्त्रस्य
ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीसदाशिवरुद्रो देवता,
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
oṃ asya śrī-śivakavaca-stotra-mantrasya
brahmā ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrī-sadāśiva-rudro devatā,
śrī-sadāśiva-prītyarthe jape viniyogaḥ ||
चन्द्रमौलि मेरे मस्तक की रक्षा करें; भालनेत्र (ललाट में नेत्र वाले) मेरे ललाट की रक्षा करें; भगनेत्रहारी मेरे नेत्रों की रक्षा करें; विश्वनाथ सदा मेरी नासिका की रक्षा करें।
Verse 3
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलिः
भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ।
नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी
नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥ १॥
mūrdhānamavyānmama candramauliḥ
bhālaṃ mamāvyādatha bhālanetraḥ |
netre mamāvyādbhaganetrahārī
nāsāṃ sadā rakṣatu viśvanāthaḥ || 1||
भवलोकवन्द्य मेरे कानों की रक्षा करें; पञ्चवक्त्र सदा मेरे मुख की रक्षा करें; वेदजिह्व मेरी जिह्वा की रक्षा करें; नीलकण्ठ गिरीश मेरे कण्ठ की रक्षा करें।
Verse 4
श्रोत्रे ममाव्याद्भवलोकवन्द्यो
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रः ।
जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वो
कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः ॥ २॥
śrotre mamāvyādbhavalokavandyo
vaktraṃ sadā rakṣatu pañcavaktraḥ |
jihvāṃ sadā rakṣatu vedajihvo
kaṇṭhaṃ girīśo'vatu nīlakaṇṭhaḥ || 2||
पिनाकपाणि मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें; धर्मबाहु मेरी भुजाओं के मूल की रक्षा करें; दक्षयज्ञान्तक मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें; गिरीश मेरे उदर की रक्षा करें।
Verse 5
पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः
दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुः ।
वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात्
ममोदरं पातु गिरीशपुत्रः ॥ ३॥
pāṇidvayaṃ pātu pinākapāṇiḥ
dormūlamavyānmama dharmabāhuḥ |
vakṣaḥsthalaṃ dakṣamakhāntako'vyāt
mamodaraṃ pātu girīśaputraḥ || 3||
विश्वनाभि मेरी नाभि की रक्षा करें; जगत्प्रतिष्ठ मेरी कटि की रक्षा करें; गुहप्रसूति मेरे गुह्य अंगों की रक्षा करें; त्रिनेत्र सदा मेरे चरणों की रक्षा करें।
Verse 6
नाभिं सदा रक्षतु विश्वनाभिः
कटिद्वयं पातु जगत्प्रतिष्ठः ।
गुह्यं सदा पातु गुहप्रसूतिः
पादौ ममाव्यात्सततं त्रिनेत्रः ॥ ४॥
nābhiṃ sadā rakṣatu viśvanābhiḥ
kaṭidvayaṃ pātu jagatpratiṣṭhaḥ |
guhyaṃ sadā pātu guhaprasūtiḥ
pādau mamāvyātsatataṃ trinetraḥ || 4||
पूर्व में शिवदेव रक्षा करें, आग्नेय में अग्निनायक; दक्षिण में यमरूपी, नैरृत्य में खड्गधारी रक्षा करें।
Verse 7
प्राच्यां पातु शिवो देवो ह्याग्नेय्यामग्निनायकः ।
दक्षिणे यमरूपी च नैरृत्यां खड्गधारकः ॥ ५॥
prācyāṃ pātu śivo devo hyāgneyyāmagnināyakaḥ |
dakṣiṇe yamarūpī ca nairṛtyāṃ khaḍgadhārakaḥ || 5||
पश्चिम में वरुण रक्षा करें, वायव्य में प्राणदायक; उत्तर में सोम, और ईशान में शङ्कर रक्षा करें।
Verse 8
पश्चिमे वरुणो रक्षेद्वायव्यां प्राणदायकः ।
उदीच्यां पातु मे सोम ईशान्यां पातु शङ्करः ॥ ६॥
paścime varuṇo rakṣedvāyavyāṃ prāṇadāyakaḥ |
udīcyāṃ pātu me soma īśānyāṃ pātu śaṅkaraḥ || 6||
जो मनुष्य इस कवच को जानकर त्रिकाल श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
Verse 9
एतत्कवचमज्ञानात्यो विजानाति मानवः ।
त्रिसन्ध्यं श्रद्धया युक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७॥
etatkavacamajñānātyo vijānāti mānavaḥ |
trisandhyaṃ śraddhayā yuktaḥ sarvānkāmānavāpnuyāt || 7||
युद्ध में, राजसभा में, द्यूत में, घोर भय में और महासंग्राम में — यह शिवमय परम अद्भुत कवच:
Verse 10
रणे राजकुले द्यूते भये घोरे महाहवे ।
इदं शिवमयं वर्म कवचं परमद्भुतम् ॥ ८॥
raṇe rājakule dyūte bhaye ghore mahāhave |
idaṃ śivamayaṃ varma kavacaṃ paramadbhutam || 8||
जो संयमी होकर इसका पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है; सदा शिवभक्ति प्राप्त कर अन्त में शिवपुर को जाता है।
Verse 11
पठेद्यो नियतो भूत्वा सर्वत्र विजयी भवेत् ।
शिवभक्तिं सदा प्राप्य सान्ते शिवपुरं व्रजेत् ॥ ९॥
paṭhedyo niyato bhūtvā sarvatra vijayī bhavet |
śivabhaktiṃ sadā prāpya sānte śivapuraṃ vrajet || 9||
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