श्री शिव कवचम् PDF
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ध्यानम् वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठमरिन्दमम् । सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शम्भुमुमापतिम् ॥
dhyānam vajradaṃṣṭraṃ trinayanaṃ kālakaṇṭhamarindamam | sahasrakaramatyugraṃ vande śambhumumāpatim ||
ध्यान: वज्र के समान दाढ़ों वाले, त्रिनेत्रधारी, नीलकण्ठ, शत्रुओं का दमन करने वाले, सहस्रबाहु, अत्यन्त उग्र — उमापति शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ।
ॐ अस्य श्रीशिवकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसदाशिवरुद्रो देवता, श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
oṃ asya śrī-śivakavaca-stotra-mantrasya brahmā ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, śrī-sadāśiva-rudro devatā, śrī-sadāśiva-prītyarthe jape viniyogaḥ ||
चन्द्रमौलि मेरे मस्तक की रक्षा करें; भालनेत्र (ललाट में नेत्र वाले) मेरे ललाट की रक्षा करें; भगनेत्रहारी मेरे नेत्रों की रक्षा करें; विश्वनाथ सदा मेरी नासिका की रक्षा करें।
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलिः भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः । नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥ १॥
mūrdhānamavyānmama candramauliḥ bhālaṃ mamāvyādatha bhālanetraḥ | netre mamāvyādbhaganetrahārī nāsāṃ sadā rakṣatu viśvanāthaḥ || 1||
भवलोकवन्द्य मेरे कानों की रक्षा करें; पञ्चवक्त्र सदा मेरे मुख की रक्षा करें; वेदजिह्व मेरी जिह्वा की रक्षा करें; नीलकण्ठ गिरीश मेरे कण्ठ की रक्षा करें।
श्रोत्रे ममाव्याद्भवलोकवन्द्यो वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रः । जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वो कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः ॥ २॥
śrotre mamāvyādbhavalokavandyo vaktraṃ sadā rakṣatu pañcavaktraḥ | jihvāṃ sadā rakṣatu vedajihvo kaṇṭhaṃ girīśo'vatu nīlakaṇṭhaḥ || 2||
पिनाकपाणि मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें; धर्मबाहु मेरी भुजाओं के मूल की रक्षा करें; दक्षयज्ञान्तक मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करें; गिरीश मेरे उदर की रक्षा करें।
पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुः । वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात् ममोदरं पातु गिरीशपुत्रः ॥ ३॥
pāṇidvayaṃ pātu pinākapāṇiḥ dormūlamavyānmama dharmabāhuḥ | vakṣaḥsthalaṃ dakṣamakhāntako'vyāt mamodaraṃ pātu girīśaputraḥ || 3||
विश्वनाभि मेरी नाभि की रक्षा करें; जगत्प्रतिष्ठ मेरी कटि की रक्षा करें; गुहप्रसूति मेरे गुह्य अंगों की रक्षा करें; त्रिनेत्र सदा मेरे चरणों की रक्षा करें।
नाभिं सदा रक्षतु विश्वनाभिः कटिद्वयं पातु जगत्प्रतिष्ठः । गुह्यं सदा पातु गुहप्रसूतिः पादौ ममाव्यात्सततं त्रिनेत्रः ॥ ४॥
nābhiṃ sadā rakṣatu viśvanābhiḥ kaṭidvayaṃ pātu jagatpratiṣṭhaḥ | guhyaṃ sadā pātu guhaprasūtiḥ pādau mamāvyātsatataṃ trinetraḥ || 4||
पूर्व में शिवदेव रक्षा करें, आग्नेय में अग्निनायक; दक्षिण में यमरूपी, नैरृत्य में खड्गधारी रक्षा करें।
प्राच्यां पातु शिवो देवो ह्याग्नेय्यामग्निनायकः । दक्षिणे यमरूपी च नैरृत्यां खड्गधारकः ॥ ५॥
prācyāṃ pātu śivo devo hyāgneyyāmagnināyakaḥ | dakṣiṇe yamarūpī ca nairṛtyāṃ khaḍgadhārakaḥ || 5||
पश्चिम में वरुण रक्षा करें, वायव्य में प्राणदायक; उत्तर में सोम, और ईशान में शङ्कर रक्षा करें।
पश्चिमे वरुणो रक्षेद्वायव्यां प्राणदायकः । उदीच्यां पातु मे सोम ईशान्यां पातु शङ्करः ॥ ६॥
paścime varuṇo rakṣedvāyavyāṃ prāṇadāyakaḥ | udīcyāṃ pātu me soma īśānyāṃ pātu śaṅkaraḥ || 6||
जो मनुष्य इस कवच को जानकर त्रिकाल श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
एतत्कवचमज्ञानात्यो विजानाति मानवः । त्रिसन्ध्यं श्रद्धया युक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७॥
etatkavacamajñānātyo vijānāti mānavaḥ | trisandhyaṃ śraddhayā yuktaḥ sarvānkāmānavāpnuyāt || 7||
युद्ध में, राजसभा में, द्यूत में, घोर भय में और महासंग्राम में — यह शिवमय परम अद्भुत कवच:
रणे राजकुले द्यूते भये घोरे महाहवे । इदं शिवमयं वर्म कवचं परमद्भुतम् ॥ ८॥
raṇe rājakule dyūte bhaye ghore mahāhave | idaṃ śivamayaṃ varma kavacaṃ paramadbhutam || 8||
जो संयमी होकर इसका पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है; सदा शिवभक्ति प्राप्त कर अन्त में शिवपुर को जाता है।
पठेद्यो नियतो भूत्वा सर्वत्र विजयी भवेत् । शिवभक्तिं सदा प्राप्य सान्ते शिवपुरं व्रजेत् ॥ ९॥
paṭhedyo niyato bhūtvā sarvatra vijayī bhavet | śivabhaktiṃ sadā prāpya sānte śivapuraṃ vrajet || 9||