शुक्र कवचम् — Complete Lyrics
शुक्र कवचम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
श्रीगणेशाय नमः ।
śrīgaṇeśāya namaḥ |
श्रीगणेश को नमस्कार। इस शुक्र कवच स्तोत्र मन्त्र के ऋषि भारद्वाज हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता श्री शुक्र हैं; शुक्र की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
Verse 2
ॐ अस्य श्रीशुक्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य भारद्वाज ऋषिः ।
अनुष्टुप्छन्दः । श्रीशुक्रो देवता ।
शुक्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
oṃ asya śrīśukrakavacastotramantrasya bhāradvāja ṛṣiḥ |
anuṣṭupchandaḥ | śrīśukro devatā |
śukraprītyarthe jape viniyogaḥ ||
मनोवांछित अर्थ की सिद्धि के लिए कवि (शुक्र) का ध्यान करना चाहिए — जो मृणाल, कुन्द, चन्द्र एवं कमल के समान सुप्रभ हैं, पीताम्बरधारी हैं, हाथ में अक्षमाला धारण किए हैं, और समस्त शास्त्रों के अर्थ एवं विधि के ज्ञाता महान् हैं।
Verse 3
मृणालकुन्देन्दुपयोजसुप्रभं
पीताम्बरं प्रसृतमक्षमालिनम् ।
समस्तशास्त्रार्थविधिं महान्तं
ध्यायेत्कविं वाञ्छितमर्थसिद्धये ॥ १॥
mṛṇālakundendupayojasuprabhaṃ
pītāmbaraṃ prasṛtamakṣamālinam |
samastaśāstrārthavidhiṃ mahāntaṃ
dhyāyetkaviṃ vāñchitamarthasiddhaye || 1||
ॐ। भार्गव मेरे शिर की रक्षा करें, ग्रहाधिप मेरे भाल की; दैत्यगुरु मेरे नेत्रों की रक्षा करें, चन्दनद्युति मेरे कानों की।
Verse 4
ॐ शिरो मे भार्गवः पातु भालं पातु ग्रहाधिपः ।
नेत्रे दैत्यगुरुः पातु श्रोत्रे मे चन्दनद्युतिः ॥ २॥
oṃ śiro me bhārgavaḥ pātu bhālaṃ pātu grahādhipaḥ |
netre daityaguruḥ pātu śrotre me candanadyutiḥ || 2||
काव्य मेरी नासिका की रक्षा करें, दैत्यवन्दित मेरे मुख की; उशनस् मेरी वाणी की रक्षा करें, श्रीकण्ठभक्तिमान् मेरे कण्ठ की।
Verse 5
पातु मे नासिकां काव्यो वदनं दैत्यवन्दितः ।
वचनं चोशनाः पातु कण्ठं श्रीकण्ठभक्तिमान् ॥ ३॥
pātu me nāsikāṃ kāvyo vadanaṃ daityavanditaḥ |
vacanaṃ cośanāḥ pātu kaṇṭhaṃ śrīkaṇṭhabhaktimān || 3||
तेजोनिधि मेरी भुजाओं की रक्षा करें, मनोव्रज मेरी कुक्षि की; भृगुसुत मेरी नाभि की रक्षा करें, महीप्रिय मेरे मध्यभाग की।
Verse 6
भुजौ तेजोनिधिः पातु कुक्षिं पातु मनोव्रजः ।
नाभिं भृगुसुतः पातु मध्यं पातु महीप्रियः ॥ ४॥
bhujau tejonidhiḥ pātu kukṣiṃ pātu manovrajaḥ |
nābhiṃ bhṛgusutaḥ pātu madhyaṃ pātu mahīpriyaḥ || 4||
विश्वात्मा मेरी कटि की रक्षा करें, सुरपूजित मेरी ऊरुओं की; जाड्यहर मेरे जानुओं की रक्षा करें, ज्ञानवानों में श्रेष्ठ मेरी जङ्घाओं की।
Verse 7
कटिं मे पातु विश्वात्मा ऊरू मे सुरपूजितः ।
जानुं जाड्यहरः पातु जङ्घे ज्ञानवतां वरः ॥ ५॥
kaṭiṃ me pātu viśvātmā ūrū me surapūjitaḥ |
jānuṃ jāḍyaharaḥ pātu jaṅghe jñānavatāṃ varaḥ || 5||
गुणनिधि मेरे गुल्फों की रक्षा करें, वराम्बर मेरे पादों की; स्वर्णमाला से सुशोभित मेरे समस्त अङ्गों की रक्षा करें।
Verse 8
गुल्फौ गुणनिधिः पातु पातु पादौ वराम्बरः ।
सर्वाण्यङ्गानि मे पातु स्वर्णमालापरिष्कृतः ॥ ६॥
gulphau guṇanidhiḥ pātu pātu pādau varāmbaraḥ |
sarvāṇyaṅgāni me pātu svarṇamālāpariṣkṛtaḥ || 6||
जो इस दिव्य कवच को श्रद्धापूर्वक पढ़ता है — भार्गव (शुक्र) की कृपा से उसे कोई पीड़ा नहीं होती।
Verse 9
य इदं कवचं दिव्यं पठति श्रद्धयान्वितः ।
न तस्य जायते पीडा भार्गवस्य प्रसादतः ॥ ७॥
ya idaṃ kavacaṃ divyaṃ paṭhati śraddhayānvitaḥ |
na tasya jāyate pīḍā bhārgavasya prasādataḥ || 7||
इस प्रकार ब्रह्माण्डपुराण में शुक्र कवच सम्पूर्ण हुआ।
Verse 10
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे शुक्रकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrībrahmāṇḍapurāṇe śukrakavacaṃ sampūrṇam ||
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