स्मरन् ममैतच्चरितम् PDF
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अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः । दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः ॥
araṇye prāntare vāpi dāvāgniparivāritaḥ dasyubhirvā vṛtaḥ śūnye gṛhīto vāpi śatrubhiḥ
वन या निर्जन प्रान्तर में दावाग्नि से घिरा हुआ, अथवा सुनसान में डाकुओं से घिरा हुआ, या शत्रुओं द्वारा पकड़ा हुआ, या सिंह-व्याघ्रों अथवा वन के जंगली हाथियों द्वारा पीछा किया हुआ, अथवा क्रुद्ध राजा की आज्ञा से वध के योग्य या बन्धन में पड़ा हुआ, या महासागर में नाव पर वायु से झकझोरा हुआ, अथवा अत्यन्त भयंकर संग्राम में गिरते हुए शस्त्रों के बीच, या समस्त घोर बाधाओं में, या वेदना से पीड़ित — जो मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करता है, वह संकट से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि, डाकू और शत्रु भी मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले से दूर ही भाग जाते हैं।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः । राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा ॥
siṃhavyāghrānuyāto vā vane vā vanahastibhiḥ rājñā kruddhena cājñapto vadhyo bandhagato'pi vā
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे । पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे ॥
āghūrṇito vā vātena sthitaḥ pote mahārṇave patatsu cāpi śastreṣu saṅgrāme bhṛśadāruṇe
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा । स्मरन् ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् ॥
sarvābādhāsu ghorāsu vedanābhyardito'pi vā smaran mamaitaccaritaṃ naro mucyeta saṅkaṭāt
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा । दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥
mama prabhāvātsiṃhādyā dasyavo vairiṇastathā dūrādeva palāyante smarataścaritaṃ mama