सौन्दर्यलहरी श्लोक २२ — भवानि त्वं दासे मयि PDF
सौन्दर्यलहरी श्लोक २२ — भवानि त्वं दासे मयि की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा- मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः । तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥ २२॥
bhavāni tvaṃ dāse mayi vitara dṛṣṭiṃ sakaruṇā- miti stotuṃ vāñchan kathayati bhavāni tvamiti yaḥ | tadaiva tvaṃ tasmai diśasi nijasāyujyapadavīṃ mukundabrahmendrasphuṭamakuṭanīrājitapadām || 22||
हे भवानि! जो भक्त केवल इतना कहकर स्तुति करना चाहता है कि 'हे भवानि, अपने इस दास पर करुणामयी दृष्टि डालिए', और केवल 'भवानि त्वम्' इन दो शब्दों को ही कहता है — उसी क्षण आप उसे अपने साथ सायुज्य-पद (एकत्व की अवस्था) प्रदान कर देती हैं, वह परम पद जिसके चरण विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र के देदीप्यमान मुकुटों से अर्चित होते हैं।