सौन्दर्यलहरी श्लोक २७ — जपो जल्पः शिल्पं PDF
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जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः । प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ २७॥
japo jalpaḥ śilpaṃ sakalamapi mudrāviracanā gatiḥ prādakṣiṇyakramaṇamaśanādyāhutividhiḥ | praṇāmassaṃveśassukhamakhilamātmārpaṇadṛśā saparyāparyāyastava bhavatu yanme vilasitam || 27||
मेरी समस्त वार्ता आपके मन्त्र का जप बन जाए; मेरे हाथों की प्रत्येक क्रिया मुद्राओं की रचना हो; मेरा चलना आपकी प्रदक्षिणा हो; मेरा भोजन आदि अग्नि में आहुति का विधान हो; मेरा लेटना आपको प्रणाम हो; और मेरे समस्त सुख आत्म-समर्पण हों। आत्मार्पण की भावना से, हे माता, मैं जो कुछ भी करूँ वह आपकी ही पूजा बन जाए।