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सौन्दर्यलहरी श्लोक ३५ — मनस्त्वं व्योम त्वं — Complete Lyrics

सौन्दर्यलहरी श्लोक ३५ — मनस्त्वं व्योम त्वं

Sanskrit text with English transliteration and translation

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां हि परम् त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ३५॥
manastvaṃ vyoma tvaṃ marudasi marutsārathirasi tvamāpastvaṃ bhūmistvayi pariṇatāyāṃ na hi param | tvameva svātmānaṃ pariṇamayituṃ viśvavapuṣā cidānandākāraṃ śivayuvati bhāvena bibhṛṣe || 35||
आप ही मन हैं; आप ही आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी हैं। जब आप इन सबके रूप में परिणत हो जाती हैं, तब आपसे परे कुछ भी शेष नहीं रहता। हे शिव की युवती (पत्नी)! चिदानन्द-स्वरूपा रहते हुए भी, अपने ही स्वरूप को सम्पूर्ण विश्व के रूप में परिणत करके, उसे धारण करने वाली आप ही हैं।

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