श्रद्धा सूक्तम् PDF
श्रद्धा सूक्तम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
श्रद्धया ग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः । श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि ॥१॥
Śraddhayāgniḥ samidhyate śraddhayā hūyate haviḥ | śraddhāṃ bhagasya mūrdhani vacasā vedayāmasi ||1||
श्रद्धा से ही अग्नि प्रज्वलित होती है, श्रद्धा से ही हवि अर्पित की जाती है। हम अपनी वाणी से श्रद्धा को भग (सौभाग्य) के शिखर पर स्थित घोषित करते हैं।
प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः । प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥२॥
Priyaṃ śraddhe dadataḥ priyaṃ śraddhe didāsataḥ | priyaṃ bhojeṣu yajvasvidaṃ ma uditaṃ kṛdhi ||2||
हे श्रद्धे, जो दान देता है उसे और जो देने की इच्छा रखता है उसे प्रिय (और कल्याणयुक्त) बनाओ; दानशील एवं यज्ञकर्ताओं में मेरी इस प्रार्थना को सफल करो।
यथा देवा असुरेषु श्रद्धामुग्रेषु चक्रिरे । एवं भोजेषु यज्वस्वस्माकमुदितं कृधि ॥३॥
Yathā devā asureṣu śraddhāmugreṣu cakrire | evaṃ bhojeṣu yajvasvasmākamuditaṃ kṛdhi ||3||
जैसे देवों ने उग्र असुरों के बीच भी श्रद्धा को दृढ़ रखा, वैसे ही दानशील एवं यज्ञकर्ताओं में हमारी इस प्रार्थना को सफल करो।
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते । श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥४॥
Śraddhāṃ devā yajamānā vāyugopā upāsate | śraddhāṃ hṛdayyayākūtyā śraddhayā vindate vasu ||4||
वायु से रक्षित यजमान देवगण श्रद्धा की उपासना करते हैं; हृदय के अन्तर्संकल्प से वे श्रद्धा की आराधना करते हैं, और श्रद्धा से ही मनुष्य समस्त धन प्राप्त करता है।
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि । श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥५॥
Śraddhāṃ prātarhavāmahe śraddhāṃ madhyaṃdinaṃ pari | śraddhāṃ sūryasya nimruci śraddhe śraddhāpayeha naḥ ||5||
हम प्रातःकाल श्रद्धा का आवाहन करते हैं, मध्याह्न में श्रद्धा का, सूर्यास्त के समय श्रद्धा का। हे श्रद्धे, यहाँ हमें श्रद्धा से युक्त करो (हमारे भीतर श्रद्धा भर दो)।