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श्री स्तुति PDF

श्री स्तुति की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

मानातीत-प्रथित-विभवां मङ्गलं मङ्गलानां वक्षःपीठीं मधु-विजयिनो भूषयन्तीं स्वकान्त्या। प्रत्यक्षानुश्रविक-महिमां श्रीधर-इति प्रतीतां श्री-रङ्गेऽस्मिन् जनयतु मम श्रीमती स्वान्-कटाक्षान्॥

Mānātīta-prathita-vibhavāṁ maṅgalaṁ maṅgalānāṁ vakṣaḥpīṭhīṁ madhu-vijayino bhūṣayantīṁ svakāntyā। Pratyakṣānuśravika-mahimāṁ śrīdhara-iti pratītāṁ śrī-raṅge'smin janayatu mama śrīmatī svān-kaṭākṣān॥

श्रीमती देवी श्री — जिनका विख्यात वैभव समस्त मानों से परे है, जो मंगलों का भी मंगल हैं, जो मधु के विजेता (विष्णु) के वक्षःस्थल को अपनी कान्ति से सुशोभित करती हैं, जिनकी महिमा प्रत्यक्ष अनुभव और श्रुति दोनों से प्रसिद्ध है और 'श्रीधर' नाम से ही प्रतीत होती है — वे यहाँ श्रीरंग में मुझ पर अपने कृपा-कटाक्ष बरसाएँ।

आविर्भावस्तव शतमखोपात्त-पुण्योदयानां पातु क्षीराम्बुधि-तनय यः प्रादुरासीत् पुरस्तात्। पर्याप्तं तं भजति महिमा यस्य ते नैव दृष्टः सिन्धोर्वेला-तट इव जगत्-त्राण-दीक्षा-गुरुस्त्वम्॥

Āvirbhāvastava śatamakhopātta-puṇyodayānāṁ pātu kṣīrāmbudhi-tanaya yaḥ prādurāsīt purastāt। Paryāptaṁ taṁ bhajati mahimā yasya te naiva dṛṣṭaḥ sindhorvelā-taṭa iva jagat-trāṇa-dīkṣā-gurustvam॥

हे क्षीरसागर की पुत्री! आपका वह आविर्भाव हमारी रक्षा करे, जो सौ यज्ञों से अर्जित पुण्य के उदय वाले देवों के समक्ष (समुद्र-मंथन के समय) सर्वप्रथम प्रकट हुआ। आपकी महिमा का अन्त किसी ने नहीं देखा, जैसे समुद्र का पार-तट कभी दिखाई नहीं देता; आप ही जगत् की रक्षा के लिए दीक्षित गुरु हैं।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रियै नमः॥

Oṁ śrīṁ hrīṁ śriyai namaḥ॥

ॐ श्रीं ह्रीं श्री को नमस्कार है।