सुख भवन संसय समन PDF
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निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहिं सुनहिं संतत सठ मना॥
nija bhavana gavaneu siṃdhu śrīraghupatihi yaha mata bhāyaū yaha carita kali malahara jathāmati dāsa tulasī gāyaū sukha bhavana saṃsaya samana davana biṣāda raghupati guna ganā taji sakala āsa bharosa gāvahiṃ sunahiṃ saṃtata saṭha manā
समुद्र अपने भवन को लौट गया और यह मत श्रीरघुपति को अच्छा लगा। कलियुग के मल को हरने वाले इस चरित्र को दास तुलसी ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्रीरघुपति के गुण-समूह सुख के धाम, संशय के नाशक और विषाद के दमन करने वाले हैं — इसलिए हे मूर्ख मन! समस्त आशा और भरोसे को छोड़कर इन्हें निरंतर गाओ और सुनो।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
sakala sumaṃgala dāyaka raghunāyaka guna gāna sādara sunahiṃ te tarahiṃ bhava siṃdhu binā jalajāna
श्रीरघुनाथ का गुण-गान समस्त शुभ मंगलों का देने वाला है; जो इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज़ के ही भवसागर को तर जाते हैं।