सूर्य कवचम् PDF
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श्रीभैरव उवाच । यो देवदेवो भगवान्भास्करो महसां निधिः । गुरुणापि कृपासिन्धुर्वक्ष्ये तस्य च कञ्चुकम् ॥
śrī-bhairava uvāca | yo deva-devo bhagavān bhāskaro mahasāṃ nidhiḥ | guruṇāpi kṛpā-sindhur vakṣye tasya ca kañcukam ||
श्रीभैरव बोले — अब मैं उस देवों के देव, भगवान भास्कर (सूर्य) के रक्षा-कवच का वर्णन करता हूँ, जो समस्त तेज के निधि हैं और देवगुरु के लिए भी कृपा के सागर हैं।
घृणिः पातु शिरोदेशं सूर्यः फालं मम सदा । आदित्यो लोचने पातु श्रोत्रे पात्वंशुमालिकः ॥
ghṛṇiḥ pātu śiro-deśaṃ sūryaḥ phālaṃ mama sadā | ādityo locane pātu śrotre pātv aṃśu-mālikaḥ ||
'घृणि' (तेजोमय सूर्य) सदा मेरे सिर की रक्षा करें, और सूर्य मेरे ललाट की रक्षा करें; आदित्य मेरे नेत्रों की रक्षा करें, और किरणों से सुशोभित (अंशुमाली) मेरे कानों की रक्षा करें।
घ्राणं पातु सदा भानुर्वदनं मे दिनेश्वरः । जिह्वां मे भास्करः पातु कण्ठं मे भक्तवत्सलः ॥
ghrāṇaṃ pātu sadā bhānur vadanaṃ me dineśvaraḥ | jihvāṃ me bhāskaraḥ pātu kaṇṭhaṃ me bhakta-vatsalaḥ ||
भानु सदा मेरी नासिका की रक्षा करें, और दिनेश्वर मेरे मुख की रक्षा करें; भास्कर मेरी जिह्वा की रक्षा करें, और भक्तवत्सल मेरे कण्ठ की रक्षा करें।
भुजौ मे पातु मार्ताण्डो हस्तौ पातु जयाय च । नाभिं ग्रहपतिः पातु हृदयं पातु भानुमान् ॥
bhujau me pātu mārtāṇḍo hastau pātu jayāya ca | nābhiṃ graha-patiḥ pātu hṛdayaṃ pātu bhānumān ||
मार्ताण्ड मेरी भुजाओं की रक्षा करें, और विजय प्रदान करते हुए मेरे हाथों की रक्षा करें; ग्रहपति मेरी नाभि की रक्षा करें, और भानुमान मेरे हृदय की रक्षा करें।
मध्यं च पातु सप्ताश्वः कटिं मे विश्वरूपकः । सर्वाङ्गं पातु मे भानुश्चित्तं देवो जगत्पतिः ॥
madhyaṃ ca pātu saptāśvaḥ kaṭiṃ me viśva-rūpakaḥ | sarvāṅgaṃ pātu me bhānuś cittaṃ devo jagat-patiḥ ||
सप्ताश्व मेरे मध्य भाग की रक्षा करें, और विश्वरूप मेरी कटि की रक्षा करें; भानु मेरे समस्त अंगों की रक्षा करें, और जगत्पति देव मेरे चित्त की रक्षा करें।
इति श्रीसूर्यकवचं सम्पूर्णम् ॥
iti śrī-sūrya-kavacaṃ sampūrṇam ||
इस प्रकार श्रीसूर्य कवच सम्पूर्ण हुआ।