तच्छं योरावृणीमहे PDF
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ॐ तच्छं योरावृणीमहे। गातुं यज्ञाय। गातुं यज्ञपतये। दैवी स्वस्तिरस्तु नः। स्वस्तिर्मानुषेभ्यः। ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम्। शं नो अस्तु द्विपदे। शं चतुष्पदे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Oṃ tac chaṃ yor ā vṛṇīmahe | gātuṃ yajñāya | gātuṃ yajñapataye | Daivī svastir astu naḥ | svastir mānuṣebhyaḥ | ūrdhvaṃ jigātu bheṣajam | Śaṃ no astu dvipade | śaṃ catuṣpade | Oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
ॐ। हम उस तत्त्व की प्रार्थना करते हैं जो सुखकारी है और जो समस्त रोग एवं कष्ट को दूर करता है। यज्ञ के लिए और यज्ञपति के लिए निर्बाध मार्ग और सफलता हो। हमें दैवी कल्याण प्राप्त हो, और समस्त मनुष्यों का कल्याण हो। औषधि (आरोग्य-शक्ति) सदा ऊपर की ओर बढ़े और प्रबल हो। हमारे द्विपदों (मनुष्यों) का कल्याण हो और चतुष्पदों (पशुओं) का भी कल्याण हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।