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त्वं स्वाहा त्वं स्वधा (ब्रह्मकृत योगनिद्रा स्तुति) PDF

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा (ब्रह्मकृत योगनिद्रा स्तुति) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

ब्रह्मोवाच त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका । सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥

brahmovāca tvaṃ svāhā tvaṃ svadhā tvaṃ hi vaṣaṭkāraḥ svarātmikā sudhā tvamakṣare nitye tridhā mātrātmikā sthitā

ब्रह्मा बोले — आप स्वाहा हैं, आप स्वधा हैं; आप ही वषट्कार और स्वर की आत्मा हैं। हे नित्ये अक्षरे! आप सुधा हैं; आप ॐकार की तीन मात्राओं रूप में और उस नित्य अर्धमात्रा रूप में स्थित हैं जो विशेष रूप से उच्चारित नहीं की जा सकती। हे देवी! आप ही संध्या, सावित्री और देवताओं की परा जननी हैं। आपसे ही यह विश्व धारण किया जाता है, आपसे ही जगत् रचा जाता है; हे देवी! आपसे ही इसका पालन होता है और अंत में आप ही इसका भक्षण करती हैं। हे जगन्मयी! सृष्टि के समय आप सृष्टिरूपा, पालन में स्थितिरूपा और जगत् के अंत में संहाररूपा हैं। आप महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह, महादेवी और महेश्वरी हैं। आप श्री, ईश्वरी, ह्री और बोधलक्षणा बुद्धि हैं; आप लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा हैं। आप उच्च-नीच सबकी परा हैं; आप ही परमेश्वरी हैं। हे सर्वात्मिके! जो कुछ भी वस्तु कहीं भी है, सत् हो या असत्, उन सबकी जो शक्ति है, वह आप ही हैं; फिर मैं आपकी पूर्ण स्तुति कैसे कर सकता हूँ? इन दोनों दुर्जय असुरों मधु और कैटभ को मोहित कीजिए, और जगत्स्वामी अच्युत विष्णु को शीघ्र जगाइए।

अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः । त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥

ardhamātrā sthitā nityā yānuccāryāviśeṣataḥ tvameva sandhyā sāvitrī tvaṃ devi jananī parā

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् । त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥

tvayaitaddhāryate viśvaṃ tvayaitat sṛjyate jagat tvayaitat pālyate devi tvamatsyante ca sarvadā

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने । तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥

visṛṣṭau sṛṣṭirūpā tvaṃ sthitirūpā ca pālane tathā saṃhṛtirūpānte jagato'sya jaganmaye

महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः । महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥

mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhā mahāsmṛtiḥ mahāmohā ca bhavatī mahādevī maheśvarī

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा । लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥

tvaṃ śrīstvamīśvarī tvaṃ hrīstvaṃ buddhirbodhalakṣaṇā lajjā puṣṭistathā tuṣṭistvaṃ śāntiḥ kṣāntireva ca

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी । यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥

parāparāṇāṃ paramā tvameva parameśvarī yacca kiñcitkvacidvastu sadasadvākhilātmike

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया । मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ । प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥

tasya sarvasya yā śaktiḥ sā tvaṃ kiṃ stūyase mayā mohayaitau durādharṣāvasurau madhukaiṭabhau prabodhaṃ ca jagatsvāmī nīyatāmacyuto laghu