त्यज दुर्जनसंसर्गम् PDF
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त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्। कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥
tyaja durjana-saṁsargaṁ bhaja sādhu-samāgamam। kuru puṇyam aho-rātraṁ smara nityam anityatām॥
दुर्जनों की संगति त्याग दो; सज्जनों का संग करो। दिन-रात पुण्य कर्म करो, और सदा सब वस्तुओं की अनित्यता का स्मरण रखो। चार संक्षिप्त आदेशों में यह श्लोक सम्यक् जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान का सम्पूर्ण मार्ग प्रस्तुत करता है।