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वराह स्तोत्रम् PDF

वराह स्तोत्रम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

चिदानन्दघनं शुद्धं विश्वमङ्गलकारकम् । मोक्षहेतुं हि तं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ १ ॥

chidānandaghanaṃ śuddhaṃ viśvamaṅgalakārakam | mokṣahetuṃ hi taṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 1 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जो चिदानन्द के घन (पुंज) हैं, शुद्ध हैं, समस्त विश्व का मंगल करने वाले और मोक्ष के हेतु हैं।

नेति नेति श्रुतिर्ब्रूते यस्य रूपं विनिर्णयन् । परब्रह्महितं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ २ ॥

neti neti śrutirbrūte yasya rūpaṃ vinirṇayan | parabrahmahitaṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 2 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जिनके रूप का निर्णय करते हुए श्रुति केवल 'नेति नेति' कहती है, जो परब्रह्म-स्वरूप परम हितकारी हैं।

तत्त्वमसीति वक्तारमाविर्भूतं जगत्पतिम् । श्रीसद्गुरुं हितं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ३ ॥

tattvamasīti vaktāramāvirbhūtaṃ jagatpatim | śrīsadguruṃ hitaṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 3 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जो 'तत्त्वमसि' (महावाक्य) के वक्ता, प्रकट हुए जगत्पति, और श्री सद्गुरु रूप परम हितकारी हैं।

रसातलगतां भूमिं गजः कमलिनीमिव । उद्दधार हि तं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ४ ॥

rasātalagatāṃ bhūmiṃ gajaḥ kamalinīmiva | uddadhāra hi taṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 4 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जिन्होंने रसातल में गई हुई पृथ्वी को वैसे ही उठा लिया जैसे हाथी कमलिनी (कमल-नाल) को।

अवधीद्यो हिरण्याक्षं विश्वकण्टकराक्षसम् । विश्वपालहितं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ५ ॥

avadhīdyo hiraṇyākṣaṃ viśvakaṇṭakarākṣasam | viśvapālahitaṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 5 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जिन्होंने विश्व को कण्टक रूप (पीड़ादायक) राक्षस हिरण्याक्ष का वध किया, जो विश्व के पालन हेतु परम हितकारी हैं।

धर्मोद्धारावतारोऽयं सज्जनावनहेतुकम् । जगत्पतिं हितं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ६ ॥

dharmoddhārāvatāro'yaṃ sajjanāvanahetukam | jagatpatiṃ hitaṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 6 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — यह धर्म के उद्धार हेतु अवतार है, जो सज्जनों की रक्षा के लिए (प्रकट हुए) जगत्पति परम हितकारी हैं।

अत्यन्तकरुणासान्द्रं जगदुद्धारकं परम् । भवतारं हि तं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ७ ॥

atyantakaruṇāsāndraṃ jagaduddhārakaṃ param | bhavatāraṃ hi taṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 7 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जो अत्यन्त करुणा से परिपूर्ण, जगत् के परम उद्धारक, और भव-सागर से तारने वाले हैं।

सदैवाक्लिष्टकर्माणं जगतःस्थितिहेतवे । भवनौकां हि तं विष्णुं वन्दे वाराहरूपिणम् ॥ ८ ॥

sadaivākliṣṭakarmāṇaṃ jagataḥsthitihetave | bhavanaukāṃ hi taṃ viṣṇuṃ vande vārāharūpiṇam || 8 ||

मैं वराह-रूपधारी उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ — जो सदा अक्लिष्ट (अनायास) कर्म करने वाले, और जगत् की स्थिति के लिए स्वयं भव-सागर की नौका रूप हैं।