वासुदेवाश्रयो मर्त्यः (विष्णु सहस्रनाम फलश्रुति) PDF
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दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥
Durgāṇyatitaratyāśu puruṣaḥ puruṣottamam | Stuvannāmasahasreṇa nityaṁ bhaktisamanvitaḥ ||
जो पुरुष भक्ति से युक्त होकर प्रतिदिन इन सहस्र नामों द्वारा पुरुषोत्तम की स्तुति करता है, वह समस्त कठिनाइयों को शीघ्र पार कर जाता है।
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥
Vāsudevāśrayo martyo vāsudevaparāyaṇaḥ | Sarvapāpaviśuddhātmā yāti brahma sanātanam ||
जो मर्त्य वासुदेव की शरण में रहता है और वासुदेव में ही तत्पर है, उसका आत्मा समस्त पापों से शुद्ध होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करता है।
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥
Na vāsudevabhaktānāmaśubhaṁ vidyate kvacit | Janmamṛtyujarāvyādhibhayaṁ naivopajāyate ||
वासुदेव के भक्तों को कहीं भी अशुभ नहीं होता; जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग का भय उनमें उत्पन्न ही नहीं होता।
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥
Imaṁ stavamadhīyānaḥ śraddhābhaktisamanvitaḥ | Yujyetātmasukhakṣāntiśrīdhṛtismṛtikīrtibhiḥ ||
जो इस स्तव का श्रद्धा और भक्ति सहित पाठ करता है, वह आत्मसुख, क्षमा, श्री, धैर्य, स्मृति और कीर्ति से सम्पन्न हो जाता है।
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः । भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥
Na krodho na ca mātsaryaṁ na lobho nāśubhā matiḥ | Bhavanti kṛtapuṇyānāṁ bhaktānāṁ puruṣottame ||
पुरुषोत्तम के भक्त पुण्यात्माओं में न क्रोध होता है, न मात्सर्य, न लोभ और न ही अशुभ बुद्धि।