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वातापि गणपतिं भजेऽहम् PDF

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वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणास्यं वरप्रदं श्री

vātāpi gaṇapatiṃ bhaje'haṃ vāraṇāsyaṃ varapradaṃ śrī

मैं वातापि के गणपति की वंदना करता हूँ — गजमुख, वरदायक।

भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणम् वीतरागिणं विनत योगिनं विश्वकारणं विघ्नवारणम्

bhūtādi saṃsevita caraṇaṃ bhūta bhautika prapañca bharaṇam vītarāgiṇaṃ vinata yoginaṃ viśvakāraṇaṃ vighnavāraṇam

जिनके चरणों की सेवा भूतगण और समस्त प्राणी करते हैं, जो समस्त भौतिक जगत् के भरण-पोषक हैं, जो वीतराग हैं, विनम्र योगियों से वंदित, विश्व के कारण और समस्त विघ्नों के निवारक हैं।

पुरा कुम्भ सम्भव मुनिवर प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं मुरारि प्रमुखाद्युपासितं मूलाधार क्षेत्रस्थितम् परादि चत्वारि वागात्मकं प्रणव स्वरूप वक्रतुण्डम् निरन्तरं निटिल चन्द्रखण्डं निज वामकर विधृतेक्षुदण्डम् करांबुज पाश बीजापूरं कलुष विदूरं भूताकारम् हरादि गुरुगुह तोषित बिम्बं हंसध्वनि भूषित हेरंबम्

purā kumbha sambhava munivara prapūjitaṃ trikoṇa madhyagataṃ murāri pramukhādyupāsitaṃ mūlādhāra kṣetrasthitam parādi catvāri vāgātmakaṃ praṇava svarūpa vakratuṇḍam nirantaraṃ niṭila candrakhaṇḍaṃ nija vāmakara vidhṛtekṣudaṇḍam karāmbuja pāśa bījāpūraṃ kaluṣa vidūraṃ bhūtākāram harādi guruguha toṣita bimbaṃ haṃsadhvani bhūṣita herambam

जो प्राचीन काल में कुम्भज मुनि अगस्त्य से पूजित हुए, जो त्रिकोण के मध्य में विराजमान हैं, जो मुरारि (विष्णु) आदि प्रमुख देवों से उपासित हैं, जो मूलाधार चक्र में स्थित हैं; जो परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी — इन चार वाणियों के स्वरूप हैं, प्रणव (ॐ) स्वरूप वक्रतुण्ड हैं, जिनके ललाट पर सदा अर्धचंद्र है, जो अपने बायें हाथ में इक्षुदण्ड (गन्ना) धारण करते हैं, जिनके कर-कमलों में पाश और बीजपूर (अनार) है; जो समस्त मलिनता से दूर हैं, जिनका स्वरूप पंचभूत है, जिनका बिम्ब हर (शिव) और गुरुगुह (स्कन्द) को आनंदित करता है — वे हंसध्वनि से विभूषित हेरम्ब — उनकी मैं वंदना करता हूँ।