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श्री वातपुरनाथाष्टकम् PDF

श्री वातपुरनाथाष्टकम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

कुन्दसुमवृन्दसममन्दहसितास्यं नन्दकुलनन्दभरतुन्दलनकन्दम् । पूतनिजगीतलवधूतदुरितं तं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ १ ॥

kundasumavṛndasamamandahasitāsyaṃ nandakulanandabharatundalanakandam | pūtanijagītalavadhūtaduritaṃ taṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 1 ||

उस वातपुर (गुरुवायुर) के नाथ को अपने हृदय-कमल में स्थापित करो, जिनका मुख कुन्द-पुष्पों के गुच्छ-समान मन्द हास से युक्त है, जो नन्द के कुल का परम आनन्द हैं, और जो पवित्रता से उनका गुणगान करने वालों के पाप को धो देते हैं। (1)

नीलतरजालधरभालहरिरम्यं लोलतरशीलयुतबालजनलीलम् । जालनतिशीलमपि पालयितुकामं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ २ ॥

nīlatarajāladharabhālahariramyaṃ lolataraśīlayutabālajanalīlam | jālanatiśīlamapi pālayitukāmaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 2 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय-कमल में स्थापित करो, जो गहरे जलधर (मेघ) समान नील एवं रमणीय हैं, बाल-लीला में रत हैं, तथा थोड़ा सा भी नमन करने वालों की भी रक्षा करना चाहते हैं। (2)

कंसरणहिंसमिह संसरणजात- क्लान्तिभरशान्तिकरकान्तिझरवीतम् । वातमुखधातुजनिपातभयघातं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ३ ॥

kaṃsaraṇahiṃsamiha saṃsaraṇajāta- klāntibharaśāntikarakāntijharavītam | vātamukhadhātujanipātabhayaghātaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 3 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जो कंस के संहारक हैं, जो संसार-जनित क्लान्ति को शान्त करने वाली कान्ति-धारा से व्याप्त हैं, तथा वात आदि धातुओं से उत्पन्न रोग-भय का नाश करते हैं। (3)

जातुधुरिपातुकमिहातुरजनं द्राक् शोकभरमूकमपि तोकमिव पान्तम् । भृङ्गरुचिसङ्गरकृदङ्गलतिकं तं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ४ ॥

jātudhuripātukamihāturajanaṃ drāk śokabharamūkamapi tokamiva pāntam | bhṛṅgarucisaṅgarakṛdaṅgalatikaṃ taṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 4 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जो आतुर जनों की तत्क्षण रक्षा करते हैं — शोक के भार से मूक हुए जीव की भी शिशु के समान रक्षा करते हैं — जिनका अङ्ग भ्रमर की कान्ति-समान लता-सदृश सुन्दर है। (4)

पापभवतापभरकोपशमनार्था- श्वासकरभासमृदुहासरुचिरास्यम् । रोगचयभोगभयवेगहरमेकं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ५ ॥

pāpabhavatāpabharakopaśamanārthā- śvāsakarabhāsamṛduhāsarucirāsyam | rogacayabhogabhayavegaharamekaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 5 ||

उस एकमात्र गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जिनका आश्वासन देने वाला, मृदु हास से रुचिर मुख पाप एवं भव-ताप से उत्पन्न कोप का शमन करता है, और जो रोग-समूह, भोग एवं भय के वेग का हरण करते हैं। (5)

घोषकुलदोषहरवेषमुपयान्तं पूषशतदूषकविभूषणगणाढ्यम् । भुक्तिमपि मुक्तिमतिभक्तिषु ददानं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ६ ॥

ghoṣakuladoṣaharaveṣamupayāntaṃ pūṣaśatadūṣakavibhūṣaṇagaṇāḍhyam | bhuktimapi muktimatibhaktiṣu dadānaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 6 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जो गोपकुल के दोष-नाशक वेष में प्रकट होते हैं, सौ सूर्यों को मात देने वाले आभूषण-समूह से सुसज्जित हैं, तथा अत्यन्त भक्तिमानों को भुक्ति एवं मुक्ति दोनों प्रदान करते हैं। (6)

पापकदुरापमतितापहरशोभ- स्वापघनमामतदुमापतिसमेतम् । दूनतरदीनसुखदानकृतदीक्षं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ७ ॥

pāpakadurāpamatitāpaharaśobha- svāpaghanamāmatadumāpatisametam | dūnataradīnasukhadānakṛtadīkṣaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 7 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जिनकी शोभा दुर्जनों के लिए दुर्लभ है तथा महान् ताप का हरण करती है — जो विश्राम के घन (मेघ) हैं — जो यहाँ उमापति (शिव) सहित विराजमान हैं, तथा अत्यन्त दीन-दुखियों को सुख देने का व्रत किए हुए हैं। (7)

पादपतदादरणमोदपरिपूर्णं जीवमुखदेवजनसेवनफलाङ्घ्रिम् । रूक्षभवमोक्षकृतदीक्षनिजवीक्षं वातपुरनाथमिममातनु हृदब्जे ॥ ८ ॥

pādapatadādaraṇamodaparipūrṇaṃ jīvamukhadevajanasevanaphalāṅghrim | rūkṣabhavamokṣakṛtadīkṣanijavīkṣaṃ vātapuranāthamimamātanu hṛdabje || 8 ||

उस गुरुवायुर के नाथ को हृदय में स्थापित करो, जो अपने चरणों में गिरने वालों के आदर से परिपूर्ण आनन्दित होते हैं — जिनके चरण जीवों एवं देवगणों की सेवा के फल-स्वरूप हैं — और जिनकी दृष्टि रूक्ष संसार से जीवों को मुक्त करने हेतु संकल्पित है। (8)

॥ इति महामहोपाध्याय ब्रह्मश्री गणपतिशास्त्रिविरचितं श्रीवातपुरनाथाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

|| iti mahāmahopādhyāya brahmaśrī gaṇapatiśāstriviracitaṃ śrīvātapuranāthāṣṭakam sampūrṇam ||

इस प्रकार महामहोपाध्याय ब्रह्मश्री गणपति शास्त्री द्वारा रचित श्रीवातपुरनाथाष्टकम् सम्पूर्ण हुआ।