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यमुनाष्टकम् PDF

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नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा मुरारिपदपङ्कजस्फुरदमन्दरेणूत्कटाम्। तटस्थनवकाननप्रकटमोदपुष्पाम्बुना सुरासुरसुपूजितस्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम्॥

namāmi yamunām ahaṃ sakala-siddhi-hetuṃ mudā murāri-pada-paṅkaja-sphurad-amanda-reṇūtkaṭām | taṭastha-nava-kānana-prakaṭa-moda-puṣpāmbunā surāsura-supūjita-smara-pituḥ śriyaṃ bibhratīm ||

मैं आनन्दपूर्वक यमुना को प्रणाम करता हूँ, जो समस्त सिद्धियों की हेतु हैं, मुरारि के चरण-कमलों की प्रचुर चमकती रज से समृद्ध हैं; जिनका जल उनके तटों के नवीन उपवनों के प्रफुल्ल पुष्पों की सुगन्ध से युक्त है, और जो देवों-असुरों से पूजित कामदेव के पिता (कृष्ण) की शोभा धारण करती हैं।

कलिन्दगिरिमस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्डशैलोन्नता। सघोषगतिदन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा मुकुन्दरतिवर्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता॥

kalinda-giri-mastake patad-amanda-pūrojjvalā vilāsa-gamanollasat-prakaṭa-gaṇḍa-śailonnatā | saghoṣa-gati-danturā samadhirūḍha-dolottamā mukunda-rati-vardhinī jayati padma-bandhoḥ sutā ||

कलिन्द-गिरि के शिखर से प्रबल धारा रूप में गिरती हुई उज्ज्वल, अपनी लीलामयी गति में प्रकट शिलाओं के ऊपर उठती हुई ऊँची, ध्वनि करते जल-प्रपातों से युक्त और श्रेष्ठ झूले के समान झूलती हुई — मुकुन्द के प्रति प्रेम बढ़ाने वाली सूर्यपुत्री यमुना की जय हो!

भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः। तरङ्गभुजकङ्कणप्रकटमुक्तिकावालुका- नितम्बतटसुन्दरीं नमत कृष्णतुर्यप्रियाम्॥

bhuvaṃ bhuvana-pāvanīm adhigatām aneka-svanaiḥ priyābhir iva sevitāṃ śuka-mayūra-haṃsādibhiḥ | taraṅga-bhuja-kaṅkaṇa-prakaṭa-muktikā-vālukā- nitamba-taṭa-sundarīṃ namata kṛṣṇa-turya-priyām ||

पृथ्वी पर आकर समस्त लोकों को पवित्र करती हुई, तोते-मोर-हंस आदि के अनेक स्वरों से मानो प्रियजनों द्वारा सेवित, जिनकी लहरें भुजाएँ हैं, प्रकट मोती जिनके कंगन हैं, और रेत के तट जिनके सुन्दर नितम्ब हैं — उन कृष्ण-प्रिया को प्रणाम करो।

अनन्तगुणभूषिते शिवविरिञ्चिदेवस्तुते घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे। विशुद्धमथुरातटे सकलगोपगोपीवृते कृपाजलधिसंश्रिते मम मनःसुखं भावय॥

ananta-guṇa-bhūṣite śiva-viriñci-deva-stute ghanāghana-nibhe sadā dhruva-parāśarābhīṣṭa-de | viśuddha-mathurā-taṭe sakala-gopa-gopī-vṛte kṛpā-jaladhi-saṃśrite mama manaḥ-sukhaṃ bhāvaya ||

हे अनन्त गुणों से विभूषित, शिव-ब्रह्मा और देवों से स्तुत, सघन मेघ के समान श्याम, ध्रुव और पराशर के अभीष्ट देने वाली; जिनके विशुद्ध तट पर मथुरा है, जो समस्त गोप-गोपियों से घिरी हैं, कृपा-सागर का आश्रय हैं — मेरे मन को सुख प्रदान करें।

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुका समागमनतोऽभवत्सकलसिद्धिदा सेवताम्। तया सदृशतामियात्कमलजा सपत्नीव यद् हरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम्॥

yayā caraṇa-padma-jā mura-ripoḥ priyaṃ bhāvukā samāgamanato 'bhavat sakala-siddhi-dā sevatām | tayā sadṛśatām iyāt kamalajā sapatnīva yad hari-priya-kalindajā manasi me sadā sthīyatām ||

जिनके स्पर्श से मुरारि के चरणों से उत्पन्न कमल भी उन्हें प्रिय हुआ और उनके संग से सेवकों को समस्त सिद्धि देने वाला बना — जिनके समान होने की कमला (लक्ष्मी) भी सपत्नी रूप में इच्छा करें — वे हरि-प्रिया कालिन्दी सदा मेरे मन में विराजें।

नमोऽस्तु यमुने सदा तव चरित्रमत्यद्भुतं न जातु यमयातना भवति ते पयःपानतः। यमोऽपि भगिनीसुतान्कथमु हन्ति दुष्टानपि प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः॥

namo 'stu yamune sadā tava caritram aty-adbhutaṃ na jātu yama-yātanā bhavati te payaḥ-pānataḥ | yamo 'pi bhaginī-sutān katham u hanti duṣṭān api priyo bhavati sevanāt tava harer yathā gopikāḥ ||

हे यमुने! आपको सदा नमस्कार हो; आपका चरित्र अत्यन्त अद्भुत है — आपका जल पीने से कभी यम-यातना नहीं होती। यम भी अपनी बहन के पुत्रों को, चाहे वे दुष्ट ही क्यों न हों, कैसे दण्ड दें? आपकी सेवा से प्राणी हरि को वैसे ही प्रिय हो जाता है जैसे गोपियाँ।

ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता न दुर्लभतमा रतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये। अतोऽस्तु तव लालना सुरधुनी परं सङ्गमात् तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः॥

mamāstu tava sannidhau tanu-navatvam etāvatā na durlabhatamā ratir mura-ripau mukunda-priye | ato 'stu tava lālanā sura-dhunī paraṃ saṅgamāt tavaiva bhuvi kīrtitā na tu kadāpi puṣṭi-sthitaiḥ ||

आपके सान्निध्य में मुझे नवीन देह प्राप्त हो; इससे, हे मुकुन्दप्रिये, मुरारि में प्रीति अत्यन्त दुर्लभ नहीं रहती। अतः मुझ पर आपका लालन हो। देवनदी गंगा भी आपके संगम से ही गौरवान्वित है; इस भूमि पर वस्तुतः आप ही कीर्तित हैं — पुष्टिमार्ग में स्थित जन इसमें कभी सन्देह नहीं करते।

स्तुतिं तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रिये हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः। इयं तव कथाधिका सकलगोपिकासङ्गम- स्मरश्रमजलाणुभिः सकलगात्रजैः सङ्गता॥

stutiṃ tava karoti kaḥ kamalajā-sapatni priye harer yad-anusevayā bhavati saukhyam ā-mokṣataḥ | iyaṃ tava kathādhikā sakala-gopikā-saṅgama- smara-śrama-jalāṇubhiḥ sakala-gātra-jaiḥ saṅgatā ||

हे कमला की प्रिय सपत्नी! आपकी स्तुति कौन कर सकता है, जिनकी हरि-सेवा से मोक्ष-पर्यन्त सुख प्राप्त होता है? आपकी महिमा इससे भी अधिक है — आप उन गोपियों के समस्त अंगों से युक्त हैं, जो कृष्ण के संग से उत्पन्न श्रम-जल की बूँदों सहित आपके पास आईं।

तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूनुर्मुदा भवेत्सपदि तत्क्षणात्तदखिलं हरेस्तत्परम्। सदा भवतु सेवने व्रजवने नगाधीश्वरी प्रकाशितनिजार्थदा हरिरयं ददाति श्रियम्॥

tavāṣṭakam idaṃ mudā paṭhati sūra-sūnur mudā bhavet sapadi tat-kṣaṇāt tad akhilaṃ hares tat-param | sadā bhavatu sevane vraja-vane nagādhīśvarī prakāśita-nijārtha-dā harir ayaṃ dadāti śriyam ||

जो भी आनन्दपूर्वक आपके इस अष्टक का पाठ करता है, वह उसी क्षण सर्वथा हरि-परायण हो जाता है। व्रज के वनों में सेवा के समय पर्वतों की अधीश्वरी यमुना सदा उपस्थित रहें; अपना निज धन प्रकट करते हुए ये हरि श्री (दिव्य सम्पदा) प्रदान करते हैं।