यत्रैतत्पठ्यते सम्यक् PDF
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उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥
upasargānaśeṣāṃstu mahāmārīsamudbhavān tathā trividhamutpātaṃ māhātmyaṃ śamayenmama
मेरा यह माहात्म्य महामारी से उत्पन्न समस्त उपसर्गों, तथा तीन प्रकार के उत्पातों को शान्त कर दे।
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम । सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥
yatraitatpaṭhyate samyaṅnityamāyatane mama sadā na tadvimokṣyāmi sānnidhyaṃ tatra me sthitam
जहाँ मेरे मन्दिर में नित्य भलीभाँति इसका पाठ होता है, वह स्थान मैं कभी नहीं छोड़ूँगी; वहाँ मेरी सन्निधि (उपस्थिति) स्थित रहती है।
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे । सर्वं ममैतन्माहात्म्यम् उच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥
balipradāne pūjāyāmagnikārye mahotsave sarvaṃ mamaitanmāhātmyam uccāryaṃ śrāvyameva ca
बलि अर्पण में, पूजा में, अग्निकार्य में और महोत्सव में — मेरा यह सम्पूर्ण माहात्म्य उच्चारण करने और सुनने योग्य है।
जानताजानता वापि बलिपूजां यथा कृताम् । प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम् ॥
jānatājānatā vāpi balipūjāṃ yathā kṛtām pratīkṣiṣyāmyahaṃ prītyā vahnihomaṃ tathākṛtam
जाने या अनजाने में जैसी भी बलि-पूजा की गई, और जैसा भी अग्नि-होम किया गया, उसे मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी।