आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः — Word-by-Word Meaning
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
आ
ā
आएँ, इधर, हमारी ओर
नः
naḥ
हमें, हमारे लिए
भद्राः
bhadrāḥ
शुभ, श्रेष्ठ, कल्याणकारी (विचार)
क्रतवः
kratavaḥ
विचार, संकल्प, प्रेरणाएँ, ज्ञान-स्फुरण
यन्तु
yantu
वे आएँ, वे प्राप्त हों
विश्वतः
viśvataḥ
सब ओर से, सर्वत्र से
अदब्धासः
adabdhāsaḥ
अकुण्ठित, अविकल, अक्षुण्ण
अपरीतासः
aparītāsaḥ
अबाधित, अनवरुद्ध, न लौटाए गए
उद्भिदः
udbhidaḥ
सदा नवीन, उद्भूत होते, (नवज्ञान) प्रकट करते
देवाः
devāḥ
देवगण, दीप्तिमान (ज्योतिर्मय)
यथा
yathā
जिससे कि, इस प्रकार कि
सदम् इत्
sadam id
सदा, सर्वदा, सब समय निश्चय ही
वृधे
vṛdhe
हमारी उन्नति, वृद्धि, समृद्धि के लिए
असन्
asan
वे हों, वे रहें
अप्रायुवः
aprāyuvaḥ
अथक, कभी प्रमाद न करने वाले, सदा सजग
रक्षितारः
rakṣitāraḥ
रक्षक, संरक्षक
दिवेदिवे
dive-dive
दिन-प्रतिदिन, प्रतिदिन
Complete Translation
हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी विचार आएँ — ऐसे विचार जो अकुण्ठित, अबाधित और सदा नवीन हों। देवगण सदा हमारी उन्नति और समृद्धि के लिए हमारे साथ रहें, जो अथक होकर प्रतिदिन हमारी रक्षा करते हैं। हमारे मन में केवल वही प्रवेश करे जो शुभ, सत्य और उन्नायक है, जिससे दिव्य शक्तियाँ सदा हमारे कल्याण को धारण और संवर्धित करती रहें।
Origin & History
Source: Rigveda 1.89.1
Author: Rishi Gotama Rahugana
Period: Vedic period (c. 1500 BCE or earlier)
यह मन्त्र विश्वेदेवों को समर्पित ऋग्वेद के एक सूक्त का आरम्भ करता है, जो रहूगण के पुत्र ऋषि गोतम को आरोपित है। यह सूक्त समस्त देवताओं की कृपा, रक्षा और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है। इसकी पहली पंक्ति — कि उपासक के पास हर दिशा से शुभ विचार आएँ — सदियों से ज्ञान, उदार मनोवृत्ति और निरन्तर दिव्य संरक्षण के लिए एक सार्वभौम प्रार्थना के रूप में अपनाई गई है।
Frequently Asked Questions
'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः' का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है 'हमारे पास सब दिशाओं से श्रेष्ठ (कल्याणकारी) विचार आएँ।' यह हर ओर से पवित्र, अकुण्ठित और सदा नवीन ज्ञान प्राप्त करने की, तथा देवताओं के हमारी उन्नति के अथक रक्षक बने रहने की प्रार्थना है।
यह मन्त्र कहाँ से है?▼
यह ऋग्वेद १.८९ का प्रथम मन्त्र है, जो विश्वेदेवों — समस्त देवताओं — को सम्बोधित स्तुति है। यह खुले और ग्रहणशील मन के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रार्थनाओं में से एक है।
यह मन्त्र प्रसिद्ध क्यों है?▼
'श्रेष्ठ विचार सब दिशाओं से आएँ' यह पंक्ति बिना पूर्वाग्रह के, किसी भी स्रोत से सत्य और ज्ञान का स्वागत करने की वैदिक भावना को सुन्दर रूप से व्यक्त करती है। स्वामी विवेकानन्द तथा अनेक आचार्यों ने इसे हिन्दू धर्म की उदारता के प्रतीक रूप में उद्धृत किया है।
यह मन्त्र कब जपना चाहिए?▼
यह अध्ययन, ध्यान, अध्यापन अथवा किसी नए कार्य के आरम्भ में सर्वोत्तम है, और शुभ, ग्रहणशील भाव स्थापित करने हेतु प्रायः शान्ति पाठ के रूप में प्रयुक्त होता है।
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