आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः
अन्य नाम / खोज: aano bhadrah kratavo yantu vishwatah · ano bhadrah kratavo yantu · a no bhadrah kratavo yantu vishvatah · let noble thoughts come to us from all directions · rigveda 1.89.1
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✦ अर्थ
यह ऋग्वेद १.८९ का प्रथम मन्त्र है, जो विश्वेदेवों (समस्त देवताओं) की स्तुति है, और खुले, ग्रहणशील मन के लिए सर्वाधिक प्रिय प्रार्थनाओं में से एक है। यह माँगता है कि शुभ और निर्मल विचार हमें हर दिशा से प्राप्त हों, और दिव्य शक्तियाँ हमारी उन्नति की सदा सजग रक्षिका बनी रहें। यह मन्त्र शान्ति पाठ के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है और सभी स्रोतों से सत्य व ज्ञान का स्वागत करने की वैदिक भावना का प्रतीक है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda 1.89.1 · Rishi Gotama Rahugana · Vedic period (c. 1500 BCE or earlier)
यह मन्त्र विश्वेदेवों को समर्पित ऋग्वेद के एक सूक्त का आरम्भ करता है, जो रहूगण के पुत्र ऋषि गोतम को आरोपित है। यह सूक्त समस्त देवताओं की कृपा, रक्षा और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है। इसकी पहली पंक्ति — कि उपासक के पास हर दिशा से शुभ विचार आएँ — सदियों से ज्ञान, उदार मनोवृत्ति और निरन्तर दिव्य संरक्षण के लिए एक सार्वभौम प्रार्थना के रूप में अपनाई गई है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
पीढ़ियों से आचार्यों ने इस मन्त्र से अध्ययन का दिन आरम्भ किया है, और विद्यार्थी साक्षी हैं कि श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने पर मन शान्त, स्वच्छ और तत्पर हो जाता है। कहा जाता है कि जो इसकी प्रार्थना के अनुसार जीता है — बिना पूर्वाग्रह के हर ओर से शुभ विचारों का स्वागत करता है — उसे वे रक्षक देवता कभी नहीं त्यागते जो ऐसे हृदय की प्रतिदिन रक्षा करते हैं।
मंत्र
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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥
Ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato 'dabdhāso aparītāsa udbhidaḥ | Devā no yathā sadam id vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive-dive ||
अर्थ:हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी विचार आएँ — ऐसे विचार जो अकुण्ठित, अबाधित और सदा नवीन हों। देवगण सदा हमारी उन्नति और समृद्धि के लिए हमारे साथ रहें, जो अथक होकर प्रतिदिन हमारी रक्षा करते हैं। हमारे मन में केवल वही प्रवेश करे जो शुभ, सत्य और उन्नायक है, जिससे दिव्य शक्तियाँ सदा हमारे कल्याण को धारण और संवर्धित करती रहें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः पाठ के लाभ
मन में सब दिशाओं से श्रेष्ठ, पवित्र और उन्नायक विचारों के प्रवेश का आवाहन करता है
हृदय और बुद्धि को, ज्ञान और सत्य जहाँ से भी आएँ, उनके लिए खोलता है
दिव्य शक्तियों की रक्षा और कृपा को प्रतिदिन आमंत्रित करता है
मानसिक संकीर्णता, पूर्वाग्रह और हठ को दूर करता है
अध्ययन, कार्य या उपासना के आरम्भ में शुभ वातावरण रचता है
उन्नति, ग्रहणशीलता और कृतज्ञता की वृत्ति का विकास करता है
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः जप विधि
अध्ययन, प्रार्थना अथवा किसी महत्वपूर्ण कार्य के आरम्भ में इस मन्त्र का जप करें, इस हार्दिक कामना के साथ कि केवल शुभ और सत्य विचार ही आप तक पहुँचें। पारम्परिक रूप से इसे शान्ति पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। प्रत्येक शब्द का सावधानी से उच्चारण करें, और शान्ति मन्त्र के रूप में पढ़ते समय 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः' से समाप्त करें। मन को खुला और विनम्र रखें, हर ओर से ज्ञान ग्रहण करने को तत्पर।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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