ईशावास्यमिदं सर्वम्
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✦ अर्थ
ईशावास्यमिदं सर्वम् ईश उपनिषद् का प्रसिद्ध प्रथम श्लोक है, जिससे उपनिषद् का नाम पड़ा। यह घोषित करता है कि इस चराचर जगत् में जो कुछ है वह सब ईश्वर से व्याप्त एवं अधिष्ठित है, अतः मनुष्य को त्यागपूर्वक जीना चाहिए — जो मिले उसका लोभरहित उपभोग करते हुए, किसी के धन की लालसा न करते हुए। एक ही श्लोक में यह सर्वत्र ईश्वर-दर्शन को अनासक्ति के गहन नीति-सिद्धान्त से जोड़ देता है।
उत्पत्ति और कथा
Isha Upanishad, Verse 1 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
ईश उपनिषद्, यद्यपि केवल अठारह श्लोकों वाला सबसे छोटा उपनिषद् है, फिर भी अत्यधिक आदरणीय है, क्योंकि यह शुक्ल यजुर्वेद की संहिता में ही समाविष्ट है। इसका प्रथम श्लोक घोषित करता है कि सम्पूर्ण गतिशील जगत् ईश — ईश्वर — से आच्छादित है, और सलाह देता है कि मनुष्य को इसलिए समस्त लोभ से रहित होकर त्यागपूर्वक जीवन का उपभोग करना चाहिए। इसी प्रथम शब्द 'ईशा' से उपनिषद् को अपना नाम मिला, और यह श्लोक संसार में रहते हुए ईश्वर के होने की वेदान्तिक जीवन-कला का एक प्रिय सार बन गया है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
मनीषी इस श्लोक को कर्म एवं त्याग के पूर्ण समन्वय के रूप में उद्धृत करते हैं — महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था कि यदि समस्त उपनिषद् एवं शास्त्र लुप्त हो जाएँ किन्तु यह एक श्लोक शेष रह जाए, तो वह सम्पूर्ण हिन्दू धर्म की शिक्षा देने हेतु पर्याप्त होगा, इतनी पूर्णता से यह एक ईश्वरीय जीवन का रहस्य अपने में समेटे हुए है।
मंत्र
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ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
īśā vāsyam idaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasyasviddhanam
अर्थ:इस चराचर जगत् में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। अतः त्याग के भाव से (उसका) उपभोग करो; किसी के धन का लोभ मत करो, क्योंकि यह धन किसका है? (यह किसी का नहीं)।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ईशावास्यमिदं सर्वम् पाठ के लाभ
समस्त वस्तुओं, प्राणियों एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त दिव्यता का दर्शन कराता है।
ग्रहण-लोलुपता के स्थान पर त्याग (त्याग) एवं अनासक्ति के द्वारा आनन्दमय जीवन का रहस्य सिखाता है।
यह स्मरण कराकर कि वस्तुतः कोई भी वस्तु किसी की नहीं, हृदय को लोभ एवं लालसा से मुक्त करता है।
सांसारिक जीवन एवं आध्यात्मिकता में समन्वय स्थापित करता है — बाहर से कर्म एवं उपभोग करते हुए भीतर से अनासक्त रहना, सब कुछ ईश्वर को अर्पित करना।
सन्तोष, समता एवं समस्त सृष्टि को ईश्वर का निवास मानकर उसके प्रति श्रद्धा का विकास करता है।
वेदान्त का एक मूल श्लोक, जो प्रायः शास्त्र-अध्ययन एवं चिन्तन के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
ईशावास्यमिदं सर्वम् जप विधि
'ईशावास्यमिदं सर्वम्' का पाठ करें और इसकी दृष्टि को हृदय में उतरने दें: जो कुछ भी आप देखते हैं — मनुष्य, वस्तुएँ, प्रकृति, अपना शरीर — उन सबमें एक ही ईश्वर को उपस्थित देखें। फिर श्लोक के उपदेश 'त्याग के द्वारा उपभोग' को धारण करें, जीवन के उपहारों को बिना आसक्ति या लोभ के कृतज्ञतापूर्वक ग्रहण करते हुए। यह अध्ययन के आरम्भ की प्रार्थना के रूप में तथा लोभ को विगलित करने एवं श्रद्धा को गहन करने हेतु नित्य चिन्तन के रूप में उत्तम है।