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ईशावास्यमिदं सर्वम्

🕉️ upanishad·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में ध्यान एवं वेदान्त-अध्ययन के समय·📜 Isha Upanishad, Verse 1

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अर्थ

ईशावास्यमिदं सर्वम् ईश उपनिषद् का प्रसिद्ध प्रथम श्लोक है, जिससे उपनिषद् का नाम पड़ा। यह घोषित करता है कि इस चराचर जगत् में जो कुछ है वह सब ईश्वर से व्याप्त एवं अधिष्ठित है, अतः मनुष्य को त्यागपूर्वक जीना चाहिए — जो मिले उसका लोभरहित उपभोग करते हुए, किसी के धन की लालसा न करते हुए। एक ही श्लोक में यह सर्वत्र ईश्वर-दर्शन को अनासक्ति के गहन नीति-सिद्धान्त से जोड़ देता है।

उत्पत्ति और कथा

Isha Upanishad, Verse 1 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic

ईश उपनिषद्, यद्यपि केवल अठारह श्लोकों वाला सबसे छोटा उपनिषद् है, फिर भी अत्यधिक आदरणीय है, क्योंकि यह शुक्ल यजुर्वेद की संहिता में ही समाविष्ट है। इसका प्रथम श्लोक घोषित करता है कि सम्पूर्ण गतिशील जगत् ईश — ईश्वर — से आच्छादित है, और सलाह देता है कि मनुष्य को इसलिए समस्त लोभ से रहित होकर त्यागपूर्वक जीवन का उपभोग करना चाहिए। इसी प्रथम शब्द 'ईशा' से उपनिषद् को अपना नाम मिला, और यह श्लोक संसार में रहते हुए ईश्वर के होने की वेदान्तिक जीवन-कला का एक प्रिय सार बन गया है।

शास्त्रों में वर्णित

मनीषी इस श्लोक को कर्म एवं त्याग के पूर्ण समन्वय के रूप में उद्धृत करते हैं — महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था कि यदि समस्त उपनिषद् एवं शास्त्र लुप्त हो जाएँ किन्तु यह एक श्लोक शेष रह जाए, तो वह सम्पूर्ण हिन्दू धर्म की शिक्षा देने हेतु पर्याप्त होगा, इतनी पूर्णता से यह एक ईश्वरीय जीवन का रहस्य अपने में समेटे हुए है।

मंत्र

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ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्

īśā vāsyam idaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasyasviddhanam

अर्थ:इस चराचर जगत् में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। अतः त्याग के भाव से (उसका) उपभोग करो; किसी के धन का लोभ मत करो, क्योंकि यह धन किसका है? (यह किसी का नहीं)।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

ईशा🔊īśāईशा — ईश्वर के द्वारा, परम शासक (ईश्वर) के द्वारा
वास्यम्🔊vāsyamवास्यम् — व्याप्त है, परिपूर्ण है, अधिष्ठित है; ईश्वर से आच्छादित किया जाने योग्य
इदं सर्वम्🔊idaṁ sarvamइदं सर्वम् — यह सब (जो कुछ भी विद्यमान है)
यत् किञ्च🔊yat kiñcaयत् किञ्च — जो कुछ भी है, जो भी है
जगत्याम् जगत्🔊jagatyāṁ jagatजगत्याम् जगत् — इस गतिशील (परिवर्तनशील) जगत् में चलायमान; ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी चलता है
तेन त्यक्तेन🔊tena tyaktenaतेन त्यक्तेन — उस त्याग के द्वारा; अनासक्ति के द्वारा (स्वामित्व-भाव को छोड़कर)
भुञ्जीथाः🔊bhuñjīthāḥभुञ्जीथाः — तुम्हें उपभोग करना चाहिए, अपना निर्वाह करना चाहिए, ग्रहण करना चाहिए
मा गृधः🔊mā gṛdhaḥमा गृधः — लोभ मत करो, लालची मत बनो
कस्य स्वित् धनम्🔊kasya svit dhanamकस्य स्वित् धनम् — यह धन किसका है? (यह धन वस्तुतः किसी का भी नहीं)

ईशावास्यमिदं सर्वम् पाठ के लाभ

समस्त वस्तुओं, प्राणियों एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त दिव्यता का दर्शन कराता है।

ग्रहण-लोलुपता के स्थान पर त्याग (त्याग) एवं अनासक्ति के द्वारा आनन्दमय जीवन का रहस्य सिखाता है।

यह स्मरण कराकर कि वस्तुतः कोई भी वस्तु किसी की नहीं, हृदय को लोभ एवं लालसा से मुक्त करता है।

सांसारिक जीवन एवं आध्यात्मिकता में समन्वय स्थापित करता है — बाहर से कर्म एवं उपभोग करते हुए भीतर से अनासक्त रहना, सब कुछ ईश्वर को अर्पित करना।

सन्तोष, समता एवं समस्त सृष्टि को ईश्वर का निवास मानकर उसके प्रति श्रद्धा का विकास करता है।

वेदान्त का एक मूल श्लोक, जो प्रायः शास्त्र-अध्ययन एवं चिन्तन के आरम्भ में पढ़ा जाता है।

ईशावास्यमिदं सर्वम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में ध्यान एवं वेदान्त-अध्ययन के समय
दिशाEast or North

'ईशावास्यमिदं सर्वम्' का पाठ करें और इसकी दृष्टि को हृदय में उतरने दें: जो कुछ भी आप देखते हैं — मनुष्य, वस्तुएँ, प्रकृति, अपना शरीर — उन सबमें एक ही ईश्वर को उपस्थित देखें। फिर श्लोक के उपदेश 'त्याग के द्वारा उपभोग' को धारण करें, जीवन के उपहारों को बिना आसक्ति या लोभ के कृतज्ञतापूर्वक ग्रहण करते हुए। यह अध्ययन के आरम्भ की प्रार्थना के रूप में तथा लोभ को विगलित करने एवं श्रद्धा को गहन करने हेतु नित्य चिन्तन के रूप में उत्तम है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है 'यह सब ईश्वर से व्याप्त है'। इस परिवर्तनशील ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है वह ईश्वर से अधिष्ठित है, अतः मनुष्य को त्यागपूर्वक जीना चाहिए — जो प्राप्त हो उसका लोभरहित उपभोग करते हुए, क्योंकि अन्ततः कोई भी धन किसी का नहीं।
यह ईश उपनिषद् का सर्वप्रथम श्लोक (श्लोक 1) है, जो शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है और वाजसनेयि संहिता का अन्तिम अध्याय बनाता है। उपनिषद् को अपना नाम इसी प्रथम शब्द 'ईशा' से प्राप्त हुआ है।
यह उपनिषद् की प्रसिद्ध शिक्षा 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः' है — स्वामित्व-भाव को त्यागकर अपना निर्वाह एवं उपभोग करो। मनुष्य संसार में रहकर, उसके उपहारों को ग्रहण करते हुए भी, भीतर से ममत्व का त्याग करता है, सब कुछ ईश्वर को समर्पित करते हुए।
'मा गृधः कस्य स्विद् धनम्' — 'लोभ मत करो, क्योंकि यह धन किसका है?' — यह पंक्ति हमें स्मरण कराती है कि वस्तुतः कोई भी वस्तु हमारी नहीं; सब कुछ ईश्वर का है। यह लोभ एवं दूसरों के धन को हड़पने की प्रवृत्ति को नष्ट कर, सन्तोष एवं ईमानदारी का विकास करती है।

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