हिरण्मयेन पात्रेण
अन्य नाम / खोज: hiranmayena patrena · hiranmayena patrena satyasyapihitam mukham · the face of truth is hidden by gold · pushan apavrinu
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✦ अर्थ
हिरण्मयेन पात्रेण ईश उपनिषद् के अन्तिम श्लोकों में से एक गहन प्रार्थना है, जो पूषन् अर्थात् सूर्य को परम तत्त्व के प्रतीक रूप में सम्बोधित है। यह कहता है कि सत्य का तेजोमय मुख एक देदीप्यमान स्वर्ण-आवरण से ढका है — वही प्रकट जगत् और सूर्य-मण्डल की चकाचौंध जो उसके पीछे स्थित सत्य को छिपा देती है। साधक प्रभु से प्रार्थना करता है कि वे इस आवरण को हटा दें, जिससे वह सत्यधर्मी जन उस परम सत्य का साक्षात् दर्शन कर सके।
उत्पत्ति और कथा
Isha Upanishad, Verse 15 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
अपने समापन की ओर, ईश उपनिषद् उपदेश से उत्कट प्रार्थना की ओर मुड़ती है। साधक, मानो तेजोमय सूर्य के सम्मुख खड़ा होकर, पुकारता है कि सत्य का मुख उसके स्वर्णमय, देदीप्यमान मण्डल के पीछे छिपा है, और पूषन् — सूर्य एवं सबके पोषक — से याचना करता है कि वे उस आवरण को हटा दें जिससे वह, सत्य का उपासक, अन्ततः वास्तविकता का दर्शन कर सके। आगे के श्लोक प्रार्थना को जारी रखते हैं, सूर्य से अपनी किरणें समेटने और अग्नि से आत्मा को उत्तम मार्ग पर ले चलने की याचना करते हैं — यही उपनिषदों की सबसे मार्मिक प्रार्थनाओं में से हैं, जो प्रायः जीवन के अन्त समय में पढ़ी जाती हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ये समापन श्लोक परम्परागत रूप से मृत्यु के समय जपे जाते हैं, जब प्राणत्याग करता जन प्रार्थना करता है कि स्वर्ण-आवरण हट जाए और आत्मा अग्नि द्वारा उज्ज्वल मार्ग से परम तत्त्व तक ले जाई जाए; ऋषि मानते हैं कि 'सत्य को अनावृत कीजिए' — यह सच्ची प्रार्थना स्वयं कृपा द्वारा पूरी होती है, और सत्य के प्रति पूर्णतया समर्पित हृदय के लिए वह आवरण हट जाता है।
मंत्र
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हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
hiraṇmayena pātreṇa satyasyāpihitaṁ mukham tat tvaṁ pūṣann apāvṛṇu satyadharmāya dṛṣṭaye
अर्थ:सत्य का मुख एक स्वर्णमय (देदीप्यमान) आवरण से ढका हुआ है। हे पूषन् (सूर्यदेव)! उस आवरण को हटा दीजिए, जिससे मैं — सत्यधर्म का पालक — उस सत्य का दर्शन कर सकूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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हिरण्मयेन पात्रेण पाठ के लाभ
आभासों के देदीप्यमान आवरण के पार सत्य के साक्षात् दर्शन हेतु एक हार्दिक प्रार्थना।
यह सिखाती है कि प्रकट जगत् की चकाचौंध ही उसके पीछे की गहन वास्तविकता को छिपा सकती है।
आध्यात्मिक दर्शन प्राप्त करने की योग्यता के रूप में सत्य-धर्म के प्रति निष्ठा विकसित करती है।
साधकों द्वारा और प्रयाण के समय परम तत्त्व के अनावरण की प्रार्थना करते हुए प्रायः जपी जाती है।
आत्म-साक्षात्कार के विघ्नों को दूर करने हेतु प्रभु (पूषन्/सूर्य रूप में) की कृपा का आवाहन करती है।
प्रतीक से आगे बढ़कर वास्तविकता तक, देखे हुए प्रकाश से स्वयं प्रकाश तक पहुँचने की लालसा प्रेरित करती है।
हिरण्मयेन पात्रेण जप विधि
'हिरण्मयेन पात्रेण' को एक सच्ची प्रार्थना के रूप में पढ़ें, आदर्श रूप से उगते या अस्त होते सूर्य के सम्मुख। चिन्तन करें कि सूर्य का स्वर्ण-मण्डल और जगमगाता जगत् एक ढक्कन के समान हैं जो भीतर के सत्य को छिपाता है — और प्रभु से, सत्य के प्रति समर्पित जन की लालसा के साथ, उस आवरण को हटाने की प्रार्थना करें। प्रार्थना को इस यजन में गहरा होने दें कि समस्त देदीप्यमान आभासों के पार वास्तविकता का साक्षात् दर्शन हो। यह उद्घाटन श्लोक 'ईशावास्यम् इदं सर्वम्' के साथ सुन्दर रूप से जुड़ती है।