हिरण्मयेन पात्रेण — Word-by-Word Meaning
हिरण्मयेन पात्रेण
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
हिरण्मयेन
hiraṇmayena
एक स्वर्णमय, देदीप्यमान (आवरण) से; सोने का बना
पात्रेण
pātreṇa
एक पात्र, चक्र अथवा आवरण से (सूर्य का तेजोमय मण्डल)
सत्यस्य
satyasya
सत्य का (परम वास्तविकता का)
अपिहितम्
apihitam
ढका हुआ, छिपा हुआ, आच्छादित
मुखम्
mukham
मुख, द्वार, सच्चा स्वरूप
तत् त्वम्
tat tvam
वह, आप (हे प्रभु)
पूषन्
pūṣan
हे पूषन् (सूर्य, सबका पोषक एवं धारणकर्ता)
अपावृणु
apāvṛṇu
हटाइए, अनावृत कीजिए, आवरण को दूर कीजिए
सत्यधर्माय
satyadharmāya
सत्य के प्रति समर्पित जन के लिए, जिसका धर्म सत्य है
दृष्टये
dṛṣṭaye
दर्शन के लिए, जिससे मैं (सत्य का) दर्शन कर सकूँ
Complete Translation
सत्य का मुख एक स्वर्णमय (देदीप्यमान) आवरण से ढका हुआ है। हे पूषन् (सूर्यदेव)! उस आवरण को हटा दीजिए, जिससे मैं — सत्यधर्म का पालक — उस सत्य का दर्शन कर सकूँ।
Origin & History
Source: Isha Upanishad, Verse 15
Author: Traditional (Upanishadic)
Period: Vedic / Upanishadic
अपने समापन की ओर, ईश उपनिषद् उपदेश से उत्कट प्रार्थना की ओर मुड़ती है। साधक, मानो तेजोमय सूर्य के सम्मुख खड़ा होकर, पुकारता है कि सत्य का मुख उसके स्वर्णमय, देदीप्यमान मण्डल के पीछे छिपा है, और पूषन् — सूर्य एवं सबके पोषक — से याचना करता है कि वे उस आवरण को हटा दें जिससे वह, सत्य का उपासक, अन्ततः वास्तविकता का दर्शन कर सके। आगे के श्लोक प्रार्थना को जारी रखते हैं, सूर्य से अपनी किरणें समेटने और अग्नि से आत्मा को उत्तम मार्ग पर ले चलने की याचना करते हैं — यही उपनिषदों की सबसे मार्मिक प्रार्थनाओं में से हैं, जो प्रायः जीवन के अन्त समय में पढ़ी जाती हैं।
Frequently Asked Questions
हिरण्मयेन पात्रेण का अर्थ क्या है?▼
इसका अर्थ है 'सत्य का मुख एक स्वर्ण-आवरण से ढका हुआ है'। साधक पूषन् अर्थात् सूर्य से प्रार्थना करता है कि वे इस देदीप्यमान आवरण को हटा दें, जिससे वह सत्यधर्मी जन परम सत्य (ब्रह्म) का साक्षात् दर्शन कर सके।
हिरण्मयेन पात्रेण कहाँ से आता है?▼
यह ईश उपनिषद् का पंद्रहवाँ (15वाँ) श्लोक है, जो शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित है। यह उपनिषद् की अन्तिम प्रार्थनाओं का आरम्भ करता है, जो पूषन् (सूर्य) और अग्नि को सम्बोधित हैं, परम तत्त्व के दर्शन और उत्तम मार्ग पर मार्गदर्शन की याचना करती हैं।
सत्य को छिपाने वाला 'स्वर्ण-आवरण' क्या है?▼
'स्वर्ण-आवरण' (हिरण्मय पात्र) सूर्य का देदीप्यमान मण्डल है और, प्रतीकात्मक रूप से, प्रकट जगत् का तेजोमय आवरण है। इसकी अपनी ही दीप्ति उसके पीछे की निराकार वास्तविकता को छिपा देती है। प्रार्थना है कि इस तेज के आवरण को हटा दिया जाए जिससे सत्य का दर्शन हो सके।
इस श्लोक में पूषन् कौन हैं?▼
पूषन् सूर्य का एक वैदिक नाम है, जिसका अर्थ है 'पोषक' अथवा 'धारणकर्ता', जो सब प्राणियों का पालन और रक्षण करते हैं। यहाँ सूर्य को परम सत्ता के प्रतीक रूप में, प्रकाश और जीवन के स्रोत के रूप में सम्बोधित किया गया है, और उनसे प्रार्थना की गई है कि वे अपने तेजोमय रूप के पीछे स्थित सत्य को प्रकट करें।
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