ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्
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✦ अर्थ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् ईश उपनिषद् का शांति-पाठ है, जो उपनिषदों के अध्ययन के आरंभ और अंत में पढ़ा जाता है। यह वेदांत के सार को व्यक्त करता है — अनंत ब्रह्म पूर्ण है, और जगत् के उत्पन्न होने पर भी वह पूर्ण ही रहता है। 'ॐ शांति शांति शांति' के साथ इसका समापन होता है।
उत्पत्ति और कथा
Isha Upanishad (Shanti Patha); also Brihadaranyaka Upanishad 5.1.1 · Vedic seers (Shukla Yajurveda tradition) · Ancient (Vedic)
यह श्लोक ईश उपनिषद् के शांति आह्वान के रूप में उसका आरंभ करता है। एक ही बिंब में — पूर्ण — यह वेदांत की अद्वैत दृष्टि को समेट लेता है: अनंत ब्रह्म पूर्ण है, उससे जन्मा जगत् पूर्ण है, और जगत् के प्रकट होने पर भी स्रोत पूर्ण ही रहता है। सहस्राब्दियों से इसने उपनिषदों के अध्ययन को रूप दिया है, साधक को स्मरण कराते हुए कि जिस आत्मा को वह खोज रहा है वह पहले से ही पूर्ण है और किसी वस्तु से रहित नहीं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
वेदांत के आचार्य कहते हैं कि यह श्लोक जीवन को बदल सकता है: जहाँ मन निरंतर यह अनुभव करता है कि उसमें किसी वस्तु की कमी है, वहाँ यह मंत्र आग्रह करता है कि तुम पहले से ही पूर्ण हो। जो साधक 'पूर्णमदः पूर्णमिदम्' के साथ बैठते हैं, वे लोभ और चिंता के शांत रूप से छूट जाने का वर्णन करते हैं — इसलिए नहीं कि कुछ जोड़ा गया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उस पूर्णता की झलक पाई जो कभी अनुपस्थित थी ही नहीं।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
Om Purnamadah Purnamidam Purnat Purnamudachyate Purnasya Purnamadaya Purnamevavashishyate
अर्थ:वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत्) भी पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण उत्पन्न होता है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Shanti Shanti Shanti
अर्थ:यह सिखाता है कि अनन्त ब्रह्म और प्रकट जगत् — दोनों पूर्ण हैं; और जगत् के उत्पन्न होने पर भी अनन्त में कोई कमी नहीं आती, वह सदा पूर्ण रहता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पाठ के लाभ
ईश उपनिषद् का 'शांति पाठ' (शांति आह्वान) — उपनिषदों के अध्ययन के आरंभ और समापन में पढ़ा जाता है।
वेदांत के हृदय को व्यक्त करता है: जगत् के उत्पन्न होने पर भी अनंत, अनंत ही रहता है।
पवित्र पठन, सत्संग और ध्यान से पूर्व मन को पूर्णता में स्थिर करने के लिए पढ़ा जाता है।
एक गहन चिंतन जो अभाव की भावना को घोल देता है — 'तुम पहले से ही पूर्ण हो'।
'ॐ शांति शांति शांति' — त्रिविध शांति — से मुहरबंद।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् जप विधि
धीरे-धीरे पाठ करें, बार-बार आने वाले शब्द 'पूर्णम्' (पूर्ण, भरा हुआ) को मन में बसने दें। किसी पवित्र ग्रंथ को खोलने से पूर्व और बंद करते समय इसका पाठ करें, 'ॐ शांति शांति शांति' से समाप्त करते हुए। एक क्षण के लिए उस पूर्णता के अनुभव में विश्राम करें जिसकी ओर यह संकेत करता है।