लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु
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✦ अर्थ
यह सभी लोकों के समस्त प्राणियों के सुख और मुक्ति के लिए एक सार्वभौमिक प्रार्थना है। इसे योग और ध्यान के अंत में जपा जाता है और इसमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना की जाती है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Sanskrit prayer of universal goodwill (loka-kshema), echoing Vedic and Puranic well-wishing · Ancient tradition · Ancient
यह आशीर्वचन हिन्दू आदर्श 'वसुधैव कुटुम्बकम्' — सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है — को एक ही पंक्ति में सार रूप में व्यक्त करता है। व्यक्तिगत लाभ माँगने के बजाय प्रार्थी प्रत्येक लोक के हर प्राणी के सुख और मुक्ति की कामना करता है। वैश्विक योग आंदोलन द्वारा भारत से बहुत दूर तक पहुँचकर यह पृथ्वी पर सर्वाधिक जपी जाने वाली संस्कृत प्रार्थनाओं में से एक बन गई है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
इस प्रार्थना की शक्ति किसी कथा में नहीं, बल्कि उसमें है जो यह जपने वाले के साथ करती है: बार-बार सभी प्राणियों के सुख की कामना करने से हृदय विशाल होता है और व्यक्तिगत चिंताएँ ढीली पड़ जाती हैं। विभिन्न परंपराओं के शिक्षक देखते हैं कि जो साधक इस पंक्ति से अभ्यास समाप्त करते हैं, वे दिनभर एक स्पष्ट शांति और दयालुता धारण करते हैं।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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ॐ लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु। लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु। लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥
Om Lokah Samastah Sukhino Bhavantu Lokah Samastah Sukhino Bhavantu Lokah Samastah Sukhino Bhavantu
अर्थ:समस्त लोकों के सभी प्राणी सुखी हों। ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Shanti Shanti Shanti
अर्थ:यह सार्वभौमिक मंगलकामना की प्रार्थना है — केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सर्वत्र हर जीव के सुख और मुक्ति के लिए।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु पाठ के लाभ
समस्त प्राणियों के सुख और कल्याण के लिए एक सार्वभौमिक प्रार्थना।
विश्व भर में योग और ध्यान सत्रों के समापन पर इसका जप किया जाता है।
करुणा और निःस्वार्थता का विकास करती है — आप केवल अपने लिए नहीं, सबके लिए प्रार्थना करते हैं।
केवल एक पंक्ति — आरंभकर्ताओं और बच्चों के लिए याद करना सरल।
सामान्यतः तीन बार दोहराई जाती है और 'ॐ शान्ति शान्ति शान्ति' से पूर्ण होती है।
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु जप विधि
शांत होकर बैठें और श्वास को कोमल करें। पंक्ति को भाव सहित तीन बार बोलें, यह संकल्प धारण करते हुए कि प्रत्येक प्राणी — ज्ञात और अज्ञात — सुखी और मुक्त हो। 'ॐ शान्ति शान्ति शान्ति' से समाप्त करें, जो शरीर, वाणी और मन के लिए त्रिविध शांति है।