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ईशावास्यमिदं सर्वम् — Word-by-Word Meaning

ईशावास्यमिदं सर्वम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

ईशा
īśā
ईशा — ईश्वर के द्वारा, परम शासक (ईश्वर) के द्वारा
वास्यम्
vāsyam
वास्यम् — व्याप्त है, परिपूर्ण है, अधिष्ठित है; ईश्वर से आच्छादित किया जाने योग्य
इदं सर्वम्
idaṁ sarvam
इदं सर्वम् — यह सब (जो कुछ भी विद्यमान है)
यत् किञ्च
yat kiñca
यत् किञ्च — जो कुछ भी है, जो भी है
जगत्याम् जगत्
jagatyāṁ jagat
जगत्याम् जगत् — इस गतिशील (परिवर्तनशील) जगत् में चलायमान; ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी चलता है
तेन त्यक्तेन
tena tyaktena
तेन त्यक्तेन — उस त्याग के द्वारा; अनासक्ति के द्वारा (स्वामित्व-भाव को छोड़कर)
भुञ्जीथाः
bhuñjīthāḥ
भुञ्जीथाः — तुम्हें उपभोग करना चाहिए, अपना निर्वाह करना चाहिए, ग्रहण करना चाहिए
मा गृधः
mā gṛdhaḥ
मा गृधः — लोभ मत करो, लालची मत बनो
कस्य स्वित् धनम्
kasya svit dhanam
कस्य स्वित् धनम् — यह धन किसका है? (यह धन वस्तुतः किसी का भी नहीं)

Complete Translation

इस चराचर जगत् में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। अतः त्याग के भाव से (उसका) उपभोग करो; किसी के धन का लोभ मत करो, क्योंकि यह धन किसका है? (यह किसी का नहीं)।

Origin & History

Source: Isha Upanishad, Verse 1

Author: Traditional (Upanishadic)

Period: Vedic / Upanishadic

ईश उपनिषद्, यद्यपि केवल अठारह श्लोकों वाला सबसे छोटा उपनिषद् है, फिर भी अत्यधिक आदरणीय है, क्योंकि यह शुक्ल यजुर्वेद की संहिता में ही समाविष्ट है। इसका प्रथम श्लोक घोषित करता है कि सम्पूर्ण गतिशील जगत् ईश — ईश्वर — से आच्छादित है, और सलाह देता है कि मनुष्य को इसलिए समस्त लोभ से रहित होकर त्यागपूर्वक जीवन का उपभोग करना चाहिए। इसी प्रथम शब्द 'ईशा' से उपनिषद् को अपना नाम मिला, और यह श्लोक संसार में रहते हुए ईश्वर के होने की वेदान्तिक जीवन-कला का एक प्रिय सार बन गया है।

Frequently Asked Questions

ईशावास्यमिदं सर्वम् का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'यह सब ईश्वर से व्याप्त है'। इस परिवर्तनशील ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है वह ईश्वर से अधिष्ठित है, अतः मनुष्य को त्यागपूर्वक जीना चाहिए — जो प्राप्त हो उसका लोभरहित उपभोग करते हुए, क्योंकि अन्ततः कोई भी धन किसी का नहीं।
ईशावास्यमिदं सर्वम् कहाँ से आया है?
यह ईश उपनिषद् का सर्वप्रथम श्लोक (श्लोक 1) है, जो शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है और वाजसनेयि संहिता का अन्तिम अध्याय बनाता है। उपनिषद् को अपना नाम इसी प्रथम शब्द 'ईशा' से प्राप्त हुआ है।
'त्याग के द्वारा उपभोग' से क्या तात्पर्य है?
यह उपनिषद् की प्रसिद्ध शिक्षा 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः' है — स्वामित्व-भाव को त्यागकर अपना निर्वाह एवं उपभोग करो। मनुष्य संसार में रहकर, उसके उपहारों को ग्रहण करते हुए भी, भीतर से ममत्व का त्याग करता है, सब कुछ ईश्वर को समर्पित करते हुए।
यह श्लोक 'धन किसका है?' क्यों पूछता है?
'मा गृधः कस्य स्विद् धनम्' — 'लोभ मत करो, क्योंकि यह धन किसका है?' — यह पंक्ति हमें स्मरण कराती है कि वस्तुतः कोई भी वस्तु हमारी नहीं; सब कुछ ईश्वर का है। यह लोभ एवं दूसरों के धन को हड़पने की प्रवृत्ति को नष्ट कर, सन्तोष एवं ईमानदारी का विकास करती है।

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