आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः — Complete Lyrics
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
Sanskrit text with English transliteration and translation
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
ālasyaṁ hi manuṣyāṇāṁ śarīrastho mahān ripuḥ।
nāsty udyama-samo bandhuḥ kṛtvā yaṁ nāvasīdati॥
आलस्य ही मनुष्यों के शरीर में स्थित महान् शत्रु है; उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं, जिसे करके मनुष्य कभी पतन को प्राप्त नहीं होता। यह चाणक्य-नीति का श्लोक आलस्य को भीतर छिपे शत्रु के रूप में बताता है और निरन्तर परिश्रम को सफलता के मार्ग का सच्चा मित्र घोषित करता है।
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