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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः — Word-by-Word Meaning

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

आलस्यम्
ālasyam
आलस्य, अकर्मण्यता, सुस्ती
हि
hi
निश्चय ही, वस्तुतः
मनुष्याणाम्
manuṣyāṇām
मनुष्यों का, लोगों के लिए
शरीरस्थः
śarīrasthaḥ
शरीर के भीतर स्थित, अन्दर निवास करने वाला
महान् रिपुः
mahān ripuḥ
एक महान् शत्रु
न अस्ति
na asti
नहीं है, विद्यमान नहीं
उद्यमसमः
udyama-samaḥ
उद्यम/परिश्रम के समान
बन्धुः
bandhuḥ
बन्धु, सम्बन्धी, सहायक
कृत्वा
kṛtvā
उसे करके/अभ्यास करके
यम्
yam
जिस (उद्यम) को
न अवसीदति
na avasīdati
मनुष्य पतन को प्राप्त नहीं होता, नष्ट नहीं होता

Complete Translation

आलस्य ही मनुष्यों के शरीर में स्थित महान् शत्रु है; उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं, जिसे करके मनुष्य कभी पतन को प्राप्त नहीं होता। यह चाणक्य-नीति का श्लोक आलस्य को भीतर छिपे शत्रु के रूप में बताता है और निरन्तर परिश्रम को सफलता के मार्ग का सच्चा मित्र घोषित करता है।

Origin & History

Source: Chanakya Niti (Subhashita)

Author: Attributed to Chanakya (Kautilya)

Period: Classical Sanskrit literature (Mauryan era tradition, c. 4th century BCE onward)

चाणक्य, महान् राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्र के रचयिता, चाणक्य-नीति परम्परा में व्यावहारिक ज्ञान, शासन और आत्म-अनुशासन पर अनेक सारगर्भित श्लोकों के लिए श्रेय पाते हैं। यह श्लोक उनके बार-बार दोहराए गए विषयों में से एक को व्यक्त करता है — कि परिश्रम सफलता का आधार है। आलस्य को शरीर के भीतर बसे शत्रु के रूप में बताकर, यह निरन्तर परिश्रम को पतन के विरुद्ध सबसे निश्चित रक्षा के रूप में आग्रह करता है।

Frequently Asked Questions

आलस्यं हि मनुष्याणां का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'आलस्य ही मनुष्यों का (महान् शत्रु) है।' पूर्ण श्लोक आलस्य को शरीर के भीतर बसे महान् शत्रु के रूप में बताता है, और उद्यम (परिश्रम) को सर्वश्रेष्ठ मित्र कहता है, क्योंकि जो परिश्रम करता है वह कभी पतन को प्राप्त नहीं होता।
यह श्लोक कहाँ से है?
यह चाणक्य परम्परा तथा विस्तृत संस्कृत सुभाषित साहित्य से सम्बद्ध एक सुप्रसिद्ध नीति-श्लोक है, जो परिश्रम और आलस्य के खतरों पर अपने प्रेरक सन्देश के लिए व्यापक रूप से उद्धृत होता है।
इस सुभाषित की मुख्य शिक्षा क्या है?
कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारे भीतर का आलस्य है, और हमारा सबसे बड़ा मित्र हमारा अपना निरन्तर परिश्रम है। उद्यम मनुष्य को असफलता से बचाता है, जबकि आलस्य पतन की ओर ले जाता है — इसलिए हमें आलस्य के बजाय परिश्रम को चुनना चाहिए।

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