आपदर्थे धनं रक्षेत् — Word-by-Word Meaning
आपदर्थे धनं रक्षेत्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
आपदर्थे
āpad-arthe
विपत्ति अथवा संकट के (समय के) लिए
धनम्
dhanam
धन, सम्पत्ति
रक्षेत्
rakṣet
रक्षा करनी चाहिए / बचाना चाहिए / संचित करना चाहिए
दारान्
dārān
स्त्री (और परिवार); गृहस्थी
धनैः
dhanaiḥ
धन के द्वारा, धन से
अपि
api
भी, और
आत्मानम्
ātmānam
स्वयं, अपना आत्म
सततम्
satatam
सदा, निरन्तर, हर समय
दारैः
dāraiḥ
स्त्री/परिवार का (त्याग करके) भी
धनैः अपि
dhanaiḥ api
और धन का (त्याग करके) भी
दारैरपि धनैरपि
dārair api dhanair api
स्त्री और धन दोनों के मूल्य पर भी (पहले आत्म की रक्षा हो)
रक्षेद् धनैरपि
rakṣed dhanair api
धन व्यय करके भी (परिवार की) रक्षा करनी चाहिए
Complete Translation
विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए; धन व्यय करके भी स्त्री एवं परिवार की रक्षा करनी चाहिए; किन्तु अपने आत्म (स्वयं) की रक्षा सदा करनी चाहिए, चाहे इसके लिए परिवार और धन दोनों ही त्यागने पड़ें। चाणक्य प्राथमिकताओं का स्पष्ट क्रम बताते हैं — धन विपत्ति से रक्षा करता है, परिवार धन से प्रिय है, परन्तु आत्म (अपना जीवन एवं अस्तित्व) सबसे ऊपर रक्षणीय है।
Origin & History
Source: Chanakya Niti
Author: Chanakya (Vishnugupta / Kautilya)
Period: Ancient India (c. 4th–3rd century BCE)
चाणक्य, जिन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य को सिंहासन तक पहुँचाया, अपने कठिन परिश्रम से अर्जित जीवन-रक्षा और समृद्धि की बुद्धि को संक्षिप्त नीति-श्लोकों में सार रूप में बाँध दिया। धन, परिवार और आत्म की रक्षा पर यह श्लोक उनकी व्यावहारिक नीति को दर्शाता है — यह उन मूल्यों का क्रम निर्धारित करता है जिन्हें एक विवेकी व्यक्ति संकट में तौलता है, और धन तथा गृहस्थी से भी ऊपर अपने आत्म की रक्षा को रखता है।
Frequently Asked Questions
'आपदर्थे धनं रक्षेत्' कहाँ से आया है?▼
यह चाणक्य नीति (नीति दर्पण) का एक प्रसिद्ध श्लोक है — यह राजनीति, अर्थशास्त्र और नीति के प्राचीन भारतीय आचार्य चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) को आरोपित सूक्तियों का संग्रह है।
इस श्लोक में प्राथमिकताओं का क्रम क्या है?▼
विपत्ति के लिए धन का संचय करना चाहिए; उस धन को व्यय करके भी परिवार (दार) की रक्षा करनी चाहिए; और अपने आत्म (आत्मन्) की सदा रक्षा करनी चाहिए, चाहे इसके लिए परिवार और धन दोनों का त्याग करना पड़े। पहले आत्म, फिर परिवार, फिर धन — यह मूल्य का आरोही क्रम है।
'पहले स्वयं की रक्षा' का अर्थ क्या स्वार्थी होना है?▼
नहीं। यह श्लोक वास्तविक संकट में विवेक की बात करता है, स्वार्थ की नहीं। इसका भाव यह है कि यदि अपना जीवन और अस्तित्व ही नष्ट हो जाए तो न परिवार की रक्षा हो सकती है, न धन का उपयोग; अतः आत्म की रक्षा वह आधार है जो अन्य सभी कर्तव्यों को संभव बनाती है।
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