आपदर्थे धनं रक्षेत् PDF
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आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥
āpad-arthe dhanaṁ rakṣed dārān rakṣed dhanair api। ātmānaṁ satataṁ rakṣed dārair api dhanair api॥
विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए; धन व्यय करके भी स्त्री एवं परिवार की रक्षा करनी चाहिए; किन्तु अपने आत्म (स्वयं) की रक्षा सदा करनी चाहिए, चाहे इसके लिए परिवार और धन दोनों ही त्यागने पड़ें। चाणक्य प्राथमिकताओं का स्पष्ट क्रम बताते हैं — धन विपत्ति से रक्षा करता है, परिवार धन से प्रिय है, परन्तु आत्म (अपना जीवन एवं अस्तित्व) सबसे ऊपर रक्षणीय है।