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आदित्यहृदयं पुण्यम् — Word-by-Word Meaning

आदित्यहृदयं पुण्यम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

आदित्यहृदयं
Adityahridayam
आदित्यहृदय — वह स्तोत्र जो सूर्यदेव (आदित्य) का साक्षात् हृदय (हृदय) है
पुण्यं
punyam
पवित्र, पुण्यदायक
सर्व
sarva
समस्त, सब
शत्रु
shatru
शत्रु, बैरी
विनाशनम्
vinashanam
नाशक, जो विनष्ट कर देता है
जयावहं
jayavaham
विजय लाने वाला; विजय का दाता
जपेत्
japet
जप करना चाहिए / पाठ करना चाहिए
नित्यम्
nityam
सदा, नित्य, प्रतिदिन
अक्षय्यं
akshayyam
अक्षय, अविनाशी, कभी न घटने वाला
परमं
paramam
परम, सर्वोच्च
शिवम्
shivam
मंगलकारी, कल्याणकारी, समस्त शुभ का मूल

Complete Translation

यह आदित्यहृदय परम पवित्र है, समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला तथा विजय प्रदान करने वाला है। नित्य जप करने पर यह अक्षय, परम और कल्याणकारी है। (इन्हीं शब्दों से अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को वह पावन सूर्य-स्तोत्र बताया जिससे वे युद्ध में समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे।)

Origin & History

Source: Aditya Hridayam, verse 4 (Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda, Sarga 105)

Author: Sage Agastya (as recorded by Maharishi Valmiki)

Period: Ancient (Ramayana, traditionally dated to the Treta Yuga; text compiled c. 500 BCE–100 CE)

लंका के रणभूमि पर भगवान राम थके हुए और चिन्ता में डूबे खड़े थे, जब रावण युद्ध के लिए आगे बढ़ा। महान ऋषि अगस्त्य, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने आए थे, राम के पास आए और बोले, 'हे महाबाहु, इस सनातन रहस्य को सुनो जिससे तुम समस्त शत्रुओं को परास्त करोगे।' फिर उन्होंने यही श्लोक घोषित किया — कि आदित्य हृदय पवित्र है, समस्त शत्रुओं का नाशक और विजय का दाता है — सूर्यदेव को सम्पूर्ण स्तोत्र प्रदान करने से पूर्व।

Frequently Asked Questions

'आदित्यहृदयम् पुण्यम्' श्लोक कहाँ से आया है?
यह आदित्य हृदयम् का चौथा श्लोक है, जो वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में मिलता है। ऋषि अगस्त्य इसे रणभूमि में भगवान राम से कहते हैं, स्तोत्र को सिखाने से पूर्व उसका वर्णन करते हुए, ताकि राम रावण को परास्त कर सकें।
इस श्लोक का सरल अर्थ क्या है?
यह घोषित करता है कि आदित्य हृदय स्तोत्र पवित्र है, समस्त शत्रुओं का नाश करता है, विजय लाता है, और प्रतिदिन जपने पर अक्षय, परम और मंगलकारी है। यह वस्तुतः भक्त को सूर्यदेव का अपना विजय का आश्वासन है।
क्या मैं सम्पूर्ण आदित्य हृदयम् के स्थान पर केवल यह श्लोक जप सकता हूँ?
हाँ। यद्यपि सम्पूर्ण आदित्य हृदयम् आदर्श है, यह श्लोक प्रायः अकेले ही सूर्य की विजय-प्रदायिनी कृपा के शक्तिशाली आवाहन के रूप में जपा जाता है, विशेषकर जब समय कम हो या किसी चुनौतीपूर्ण कार्य से पूर्व।
अगस्त्य ने यह राम को क्यों सिखाया?
राम युद्ध में रावण के सम्मुख थके और चिन्तित खड़े थे। अगस्त्य प्रकट हुए और उन्हें यह 'गुह्य, सनातन' स्तोत्र (गुह्यं सनातनम्) दिया, यह आश्वासन देते हुए कि इसके द्वारा वे समस्त शत्रुओं को जीतेंगे — और सचमुच राम ने तब रावण को परास्त किया।

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