आदित्यहृदयं पुण्यम्
अन्य नाम / खोज: adityahridayam punyam · aditya hridayam punyam sarvashatruvinashanam · jayavaham japennityam · aditya hridaya victory verse
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✦ अर्थ
यह वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड से आदित्य हृदयम् का प्रसिद्ध आरम्भिक प्रतिज्ञा-श्लोक है, जिसमें ऋषि अगस्त्य भगवान राम को यह स्तोत्र सिखाने से पूर्व स्वयं स्तोत्र का वर्णन करते हैं। यह आदित्य हृदय को पवित्र, समस्त शत्रुओं का नाशक, विजय का दाता, अक्षय और परम मंगलकारी घोषित करता है। केवल इस एक श्लोक का पाठ सूर्य की रक्षक कृपा का आवाहन करता है और विपत्ति पर विजय हेतु जपा जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Aditya Hridayam, verse 4 (Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda, Sarga 105) · Sage Agastya (as recorded by Maharishi Valmiki) · Ancient (Ramayana, traditionally dated to the Treta Yuga; text compiled c. 500 BCE–100 CE)
लंका के रणभूमि पर भगवान राम थके हुए और चिन्ता में डूबे खड़े थे, जब रावण युद्ध के लिए आगे बढ़ा। महान ऋषि अगस्त्य, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने आए थे, राम के पास आए और बोले, 'हे महाबाहु, इस सनातन रहस्य को सुनो जिससे तुम समस्त शत्रुओं को परास्त करोगे।' फिर उन्होंने यही श्लोक घोषित किया — कि आदित्य हृदय पवित्र है, समस्त शत्रुओं का नाशक और विजय का दाता है — सूर्यदेव को सम्पूर्ण स्तोत्र प्रदान करने से पूर्व।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा कहती है कि अगस्त्य से यह स्तोत्र प्राप्त कर और सूर्य की ओर देखते हुए इसे तीन बार जपने के पश्चात्, भगवान राम का शोक विलीन हो गया, उनका बल दुगुना हो गया, और उन्होंने उसी दिन रावण का वध किया — यही कारण है कि यह श्लोक प्रतीत होते असम्भव शत्रुओं पर निर्णायक विजय हेतु जपा जाता है।
मंत्र
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आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥
Adityahridayam punyam sarvashatruvinashanam Jayavaham japennityamakshayyam paramam shivam
अर्थ:यह आदित्यहृदय परम पवित्र है, समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला तथा विजय प्रदान करने वाला है। नित्य जप करने पर यह अक्षय, परम और कल्याणकारी है। (इन्हीं शब्दों से अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को वह पावन सूर्य-स्तोत्र बताया जिससे वे युद्ध में समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे।)
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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आदित्यहृदयं पुण्यम् पाठ के लाभ
किसी भी कठिन कार्य से पूर्व सूर्यदेव की विजय-प्रदायिनी (जयावहम्) शक्ति का आवाहन करता है।
परम्परा से समस्त शत्रुओं और बाधाओं का नाश करने वाला (सर्व-शत्रु-विनाशनम्) माना जाता है।
प्रतिदिन जपने पर अक्षय (अक्षय्य) पुण्य और परम मंगल प्रदान करता है।
भय और निराशा को दूर करता है, जैसे रावण से युद्ध से पूर्व राम का शोक इसने दूर किया।
एक छोटा, सरलता से कण्ठस्थ होने वाला श्लोक जो सम्पूर्ण आदित्य हृदयम् का सार धारण करता है।
संघर्ष या प्रतिस्पर्धा का सामना करने वालों के लिए साहस, संकल्प-शक्ति और आन्तरिक तेज को बढ़ाता है।
आदित्यहृदयं पुण्यम् जप विधि
उदित होते सूर्य की ओर मुख कर अर्घ्य (जल) अर्पित करें और इस श्लोक का तीन बार जप करें (एतत् त्रिगुणितम् — 'तीन बार') जैसा अगस्त्य ने राम को निर्देश दिया। इसे सम्पूर्ण आदित्य हृदयम् से पूर्व, परीक्षा, न्यायालयीन मामले, प्रतिस्पर्धा या किसी निर्णायक कार्य से पूर्व स्वतंत्र आवाहन के रूप में पढ़ा जा सकता है। पाठ करते समय स्वच्छता और स्थिर, एकाग्र मन बनाए रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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