Mantra.Tips

अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्) Meaning — Line by Line

अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्)

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्) with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

Jump to a verse ▾
  1. Verse 1. nāhaṃ deho nendriyāṇy antaraṅgo
  2. Verse 2. rajjv-ajñānād bhāti rajjau yathāhiḥ
  3. Verse 3. ābhātīdaṃ viśvam ātmany asatyaṃ
  4. Verse 4. nāhaṃ jāto na pravṛddho na naṣṭo
  5. Verse 5. matto nānyat kiñcid atrāsti viśvaṃ
Verse 1#

nāhaṃ deho nendriyāṇy antaraṅgo

नाहं देहो नेन्द्रियाण्यन्तरङ्गो नाहङ्कारः प्राणवर्गो बुद्धिः। दारापत्यक्षेत्रवित्तादिदूरः साक्षी नित्यः प्रत्यगात्मा शिवोऽहम्॥१॥

nāhaṃ deho nendriyāṇy antaraṅgo nāhaṅkāraḥ prāṇavargo na buddhiḥ | dārāpatya-kṣetra-vittādi-dūraḥ sākṣī nityaḥ pratyagātmā śivo'ham ||1||

Meaningमैं देह नहीं हूँ, न इन्द्रियाँ हूँ, न अन्तःकरण (मन) हूँ; न अहंकार हूँ, न प्राणसमूह हूँ, न बुद्धि हूँ। स्त्री, पुत्र, क्षेत्र, धन आदि से सर्वथा परे — मैं नित्य साक्षी, प्रत्यगात्मा हूँ — मैं शिव हूँ।

Verse 2#

rajjv-ajñānād bhāti rajjau yathāhiḥ

रज्ज्वज्ञानाद्भाति रज्जौ यथाहिः स्वात्माज्ञानादात्मनो जीवभावः। आप्तोक्त्याहिभ्रान्तिनाशे रज्जुर् जीवो नाहं देशिकोक्त्या शिवोऽहम्॥२॥

rajjv-ajñānād bhāti rajjau yathāhiḥ svātmājñānād ātmano jīvabhāvaḥ | āptoktyā-hi-bhrānti-nāśe sa rajjur jīvo nāhaṃ deśikoktyā śivo'ham ||2||

Meaningजैसे रज्जु के अज्ञान से रज्जु में सर्प प्रतीत होता है, वैसे ही अपने आत्मा के अज्ञान से आत्मा में जीवभाव प्रतीत होता है। जैसे आप्त पुरुष के वचन से 'यह तो रस्सी है' कहने पर सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है, वैसे ही गुरु के उपदेश से मैं जीव नहीं हूँ — मैं शिव हूँ।

Verse 3#

ābhātīdaṃ viśvam ātmany asatyaṃ

आभातीदं विश्वमात्मन्यसत्यं सत्यज्ञानानन्दरूपे विमोहात्। निद्रामोहात्स्वप्नवत्तन्न सत्यं शुद्धः पूर्णो नित्य एकः शिवोऽहम्॥३॥

ābhātīdaṃ viśvam ātmany asatyaṃ satya-jñānānanda-rūpe vimohāt | nidrā-mohāt svapnavat tan na satyaṃ śuddhaḥ pūrṇo nitya ekaḥ śivo'ham ||3||

Meaningसत्य-ज्ञान-आनन्दस्वरूप मुझमें यह असत्य विश्व मोह के कारण प्रतीत होता है; किन्तु निद्रा के मोह से उत्पन्न स्वप्न के समान वह सत्य नहीं है। शुद्ध, पूर्ण, नित्य, एक — मैं शिव हूँ।

Verse 4#

nāhaṃ jāto na pravṛddho na naṣṭo

नाहं जातो प्रवृद्धो नष्टो देहस्योक्ताः प्राकृताः सर्वधर्माः। कर्तृत्वादिश्चिन्मयस्यास्ति नाहं- कारस्यैव ह्यात्मनो मे शिवोऽहम्॥४॥

nāhaṃ jāto na pravṛddho na naṣṭo dehasyoktāḥ prākṛtāḥ sarva-dharmāḥ | kartṛtvādiś cinmayasyāsti nāhaṃ- kārasyaiva hy ātmano me śivo'ham ||4||

Meaningमैं न जन्म लेता हूँ, न बढ़ता हूँ, न नष्ट होता हूँ; ये सब तो देह के प्राकृतिक धर्म कहे गए हैं। कर्तृत्व आदि तो अहंकार के ही हैं, चिन्मय आत्मा के नहीं — मैं शिव हूँ।

Verse 5#

matto nānyat kiñcid atrāsti viśvaṃ

मत्तो नान्यत्किञ्चिदत्रास्ति विश्वं सत्यं बाह्यं वस्तु मायोपकॢप्तम्। आदर्शान्तर्भासमानस्य तुल्यं मय्यद्वैते भाति तस्माच्छिवोऽहम्॥५॥

matto nānyat kiñcid atrāsti viśvaṃ satyaṃ bāhyaṃ vastu māyopaklṛptam | ādarśāntar-bhāsamānasya tulyaṃ mayy advaite bhāti tasmāc chivo'ham ||5||

Meaningमुझसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; बाह्य वस्तु को सत्य मानना माया की कल्पना मात्र है। जैसे दर्पण के भीतर प्रतिबिम्ब भासता है, वैसे ही वह मुझ अद्वैत में भासता है — इसलिए मैं शिव हूँ।

Word-by-Word Breakdown

न अहं देहः
na ahaṃ dehaḥ
मैं देह नहीं हूँ
न इन्द्रियाणि
na indriyāṇi
न इन्द्रियाँ
अन्तरङ्गः
antaraṅgaḥ
अन्तःकरण (मन); मैं अन्तःकरण भी नहीं हूँ
न अहङ्कारः
na ahaṅkāraḥ
न अहंकार
प्राणवर्गः
prāṇavargaḥ
प्राणों का समूह; न प्राण
न बुद्धिः
na buddhiḥ
न बुद्धि
दारापत्यक्षेत्रवित्तादिदूरः
dārāpatya-kṣetra-vittādi-dūraḥ
स्त्री, पुत्र, क्षेत्र, धन आदि से सर्वथा दूर
साक्षी नित्यः
sākṣī nityaḥ
नित्य साक्षी
प्रत्यगात्मा
pratyagātmā
अन्तरतम आत्मा (प्रत्यगात्मा)
शिवोऽहम्
śivo'ham
मैं शिव हूँ (मंगलमय, शुद्ध चैतन्य)
रज्ज्वज्ञानात्
rajjv-ajñānāt
रज्जु के अज्ञान से
भाति रज्जौ यथा अहिः
bhāti rajjau yathā ahiḥ
जैसे रज्जु में सर्प प्रतीत होता है
स्वात्माज्ञानात्
svātmājñānāt
अपने आत्मा के अज्ञान से
आत्मनः जीवभावः
ātmano jīvabhāvaḥ
आत्मा में जीवभाव (परिमित जीव होने का बोध) उत्पन्न होता है
देशिकोक्त्या
deśikoktyā
गुरु के वचन (उपदेश) से
आभाति इदं विश्वम् असत्यम्
ābhāti idaṃ viśvam asatyam
यह असत्य विश्व प्रतीत होता है
सत्यज्ञानानन्दरूपे
satya-jñānānanda-rūpe
सत्य-ज्ञान-आनन्दस्वरूप (सच्चिदानन्द) में
विमोहात्
vimohāt
मोह के कारण
स्वप्नवत् तत् न सत्यम्
svapnavat tat na satyam
स्वप्न के समान वह सत्य नहीं है
शुद्धः पूर्णः नित्यः एकः
śuddhaḥ pūrṇaḥ nityaḥ ekaḥ
शुद्ध, पूर्ण (अनन्त), नित्य, एक (अद्वितीय)
न अहं जातः न प्रवृद्धः न नष्टः
na ahaṃ jātaḥ na pravṛddho na naṣṭaḥ
मैं न जन्म लेता हूँ, न बढ़ता हूँ, न नष्ट होता हूँ
मत्तः न अन्यत् किञ्चित्
matto na anyat kiñcit
मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है
आदर्शान्तर्भासमानस्य तुल्यम्
ādarśāntar-bhāsamānasya tulyam
जैसे दर्पण के भीतर प्रतिबिम्ब भासता है
मयि अद्वैते भाति
mayy advaite bhāti
मुझ अद्वैत में भासता है

Origin & History

Source: Prakarana (independent Advaita hymn) ascribed to Adi Shankaracharya

Author: Adi Shankaracharya

Period: Classical (traditionally 8th century CE)

अद्वैत पञ्चरत्नम्, जिसका दूसरा नाम आत्मपञ्चकम् है, आदि शंकराचार्य के उन संक्षिप्त प्रकरण-स्तोत्रों के समूह से सम्बद्ध है जो अद्वैत वेदान्त के उपदेश को कुछ ही श्लोकों में समेट देते हैं। निर्वाण षट्कम् और दशश्लोकी की भाँति यह साधक के देह, इन्द्रिय, मन और प्रतीयमान जगत् के साथ तादात्म्य का निषेध करता है, और आत्मा को 'शिव' — एक, शुद्ध, साक्षी चैतन्य — के रूप में स्थापित करता है। इसकी पुष्पिका इसे गोविन्द भगवत्पाद के शिष्य श्री शंकर भगवत्पाद का बताती है।

Frequently Asked Questions

अद्वैत पञ्चरत्नम् क्या है?
यह आदि शंकराचार्य रचित पाँच श्लोकों ('पञ्च' = पाँच, 'रत्नम्' = रत्न) का एक संक्षिप्त स्तोत्र है जो अद्वैत (अद्वय) के दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। इसे आत्मपञ्चकम्, 'आत्मा पर पाँच श्लोक' भी कहा जाता है।
प्रत्येक श्लोक 'शिवोऽहम्' से क्यों समाप्त होता है?
'शिवोऽहम्' का अर्थ है 'मैं शिव हूँ' — यहाँ व्यक्तिगत देवता नहीं, अपितु मंगलमय, सदा-शुद्ध, अद्वैत चैतन्य जो अपना यथार्थ स्वरूप (आत्मा/ब्रह्म) है। यह टेक देह, मन और जगत् के प्रत्येक निषेध के पश्चात् साधक की वास्तविक पहचान की पुष्टि करती है।
दूसरे श्लोक में रज्जु-सर्प का दृष्टान्त क्या है?
मन्द प्रकाश में कुण्डलित रस्सी सर्प समझ ली जा सकती है; जैसे ही कोई विश्वसनीय व्यक्ति कहता है 'यह तो रस्सी है', भय तत्क्षण मिट जाता है। इसी प्रकार अज्ञान के कारण अनन्त आत्मा परिमित जीव-सा प्रतीत होता है; गुरु का उपदेश इस भ्रम को दूर कर देता है, और 'मैं शिव हूँ' प्रकट होता है।
क्या यह निर्वाण षट्कम् के समान है?
दोनों देह और मन के तादात्म्य का निषेध करने का वही अद्वैत भाव साझा करते हैं, किन्तु ये पृथक् रचनाएँ हैं। निर्वाण षट्कम् में छह श्लोक हैं जो 'शिवोऽहम् शिवोऽहम्' से समाप्त होते हैं, जबकि अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्) में पाँच श्लोक हैं जो 'शिवोऽहम्' से समाप्त होते हैं।

Ready to start chanting?

See Benefits & How to Chant →