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अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्) PDF

अद्वैत पञ्चरत्नम् (आत्मपञ्चकम्) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

नाहं देहो नेन्द्रियाण्यन्तरङ्गो नाहङ्कारः प्राणवर्गो न बुद्धिः। दारापत्यक्षेत्रवित्तादिदूरः साक्षी नित्यः प्रत्यगात्मा शिवोऽहम्॥१॥

nāhaṃ deho nendriyāṇy antaraṅgo nāhaṅkāraḥ prāṇavargo na buddhiḥ | dārāpatya-kṣetra-vittādi-dūraḥ sākṣī nityaḥ pratyagātmā śivo'ham ||1||

मैं देह नहीं हूँ, न इन्द्रियाँ हूँ, न अन्तःकरण (मन) हूँ; न अहंकार हूँ, न प्राणसमूह हूँ, न बुद्धि हूँ। स्त्री, पुत्र, क्षेत्र, धन आदि से सर्वथा परे — मैं नित्य साक्षी, प्रत्यगात्मा हूँ — मैं शिव हूँ।

रज्ज्वज्ञानाद्भाति रज्जौ यथाहिः स्वात्माज्ञानादात्मनो जीवभावः। आप्तोक्त्याहिभ्रान्तिनाशे स रज्जुर् जीवो नाहं देशिकोक्त्या शिवोऽहम्॥२॥

rajjv-ajñānād bhāti rajjau yathāhiḥ svātmājñānād ātmano jīvabhāvaḥ | āptoktyā-hi-bhrānti-nāśe sa rajjur jīvo nāhaṃ deśikoktyā śivo'ham ||2||

जैसे रज्जु के अज्ञान से रज्जु में सर्प प्रतीत होता है, वैसे ही अपने आत्मा के अज्ञान से आत्मा में जीवभाव प्रतीत होता है। जैसे आप्त पुरुष के वचन से 'यह तो रस्सी है' कहने पर सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है, वैसे ही गुरु के उपदेश से मैं जीव नहीं हूँ — मैं शिव हूँ।

आभातीदं विश्वमात्मन्यसत्यं सत्यज्ञानानन्दरूपे विमोहात्। निद्रामोहात्स्वप्नवत्तन्न सत्यं शुद्धः पूर्णो नित्य एकः शिवोऽहम्॥३॥

ābhātīdaṃ viśvam ātmany asatyaṃ satya-jñānānanda-rūpe vimohāt | nidrā-mohāt svapnavat tan na satyaṃ śuddhaḥ pūrṇo nitya ekaḥ śivo'ham ||3||

सत्य-ज्ञान-आनन्दस्वरूप मुझमें यह असत्य विश्व मोह के कारण प्रतीत होता है; किन्तु निद्रा के मोह से उत्पन्न स्वप्न के समान वह सत्य नहीं है। शुद्ध, पूर्ण, नित्य, एक — मैं शिव हूँ।

नाहं जातो न प्रवृद्धो न नष्टो देहस्योक्ताः प्राकृताः सर्वधर्माः। कर्तृत्वादिश्चिन्मयस्यास्ति नाहं- कारस्यैव ह्यात्मनो मे शिवोऽहम्॥४॥

nāhaṃ jāto na pravṛddho na naṣṭo dehasyoktāḥ prākṛtāḥ sarva-dharmāḥ | kartṛtvādiś cinmayasyāsti nāhaṃ- kārasyaiva hy ātmano me śivo'ham ||4||

मैं न जन्म लेता हूँ, न बढ़ता हूँ, न नष्ट होता हूँ; ये सब तो देह के प्राकृतिक धर्म कहे गए हैं। कर्तृत्व आदि तो अहंकार के ही हैं, चिन्मय आत्मा के नहीं — मैं शिव हूँ।

मत्तो नान्यत्किञ्चिदत्रास्ति विश्वं सत्यं बाह्यं वस्तु मायोपकॢप्तम्। आदर्शान्तर्भासमानस्य तुल्यं मय्यद्वैते भाति तस्माच्छिवोऽहम्॥५॥

matto nānyat kiñcid atrāsti viśvaṃ satyaṃ bāhyaṃ vastu māyopaklṛptam | ādarśāntar-bhāsamānasya tulyaṃ mayy advaite bhāti tasmāc chivo'ham ||5||

मुझसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है; बाह्य वस्तु को सत्य मानना माया की कल्पना मात्र है। जैसे दर्पण के भीतर प्रतिबिम्ब भासता है, वैसे ही वह मुझ अद्वैत में भासता है — इसलिए मैं शिव हूँ।