अघमर्षण सूक्तम् PDF
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ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥१॥
Ṛtaṃ ca satyaṃ cābhīddhāttapaso'dhyajāyata | tato rātryajāyata tataḥ samudro arṇavaḥ ||1||
तेजोमय तप (सृष्टि की उष्णता एवं तपस्या) से ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) और सत्य उत्पन्न हुए; उससे रात्रि उत्पन्न हुई, और उससे तरंगित, गहन समुद्र (ब्रह्माण्डीय जल) उत्पन्न हुआ।
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ॥२॥
Samudrādarṇavādadhi saṃvatsaro ajāyata | ahorātrāṇi vidadhadviśvasya miṣato vaśī ||2||
उस तरंगित समुद्र से संवत्सर (वर्ष — काल का मान) उत्पन्न हुआ, जो दिन-रात का विधान करने वाला तथा समस्त चेतन (पलक झपकाने वाले) प्राणियों का स्वामी है।
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥३॥
Sūryācandramasau dhātā yathāpūrvamakalpayat | divaṃ ca pṛthivīṃ cāntarikṣamatho svaḥ ||3||
धाता (सृष्टिकर्ता) ने पूर्व कल्पों की भाँति सूर्य और चन्द्रमा की रचना की, तथा द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्लोक (प्रकाशमय लोक) की भी।