अघमर्षण सूक्तम्
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✦ अर्थ
अघमर्षण सूक्तम् ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त १९०) का तीन मन्त्रों का संक्षिप्त सृष्टि-सूक्त है, जो वर्णन करता है कि किस प्रकार ऋत, सत्य, रात्रि, समुद्र, काल, सूर्य, चन्द्र तथा लोक क्रमशः आदि-तप से उत्पन्न हुए। इसका नाम 'अघ-मर्षण' (पाप को मिटाने वाला) इसकी महान शुद्धिकारक शक्ति को दर्शाता है: यह नित्य सन्ध्यावन्दन में, स्नान के समय तथा प्रायश्चित्त रूप में जपा जाता है, जहाँ ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का चिन्तन पापों का नाश करता है। संक्षिप्त होते हुए भी यह वेद के सर्वाधिक पूज्य शुद्धिकारक मन्त्रों में से एक है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda (Mandala 10, Sukta 190) · Rishi Aghamarshana Madhucchandasa · Vedic period (c. 1500-1000 BCE)
अघमर्षण सूक्तम् ऋग्वेद के लगभग अन्त में स्थित है और परम्परा से ऋषि अघमर्षण, मधुच्छन्दा के पुत्र, को आरोपित है। केवल तीन मन्त्रों का होते हुए भी यह वेद के महान सृष्टि-सूक्तों में से एक है, जो वर्णन करता है कि किस प्रकार ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और सत्य, रात्रि, ब्रह्माण्डीय समुद्र, काल, ज्योतिर्मण्डल और लोक क्रमशः आदि-तप से प्रकट हुए। अपनी विषय-वस्तु तथा अपने ऋषि के नाम से इसे सर्वोच्च 'पापमर्षक' मन्त्र की भूमिका प्राप्त हुई: सन्ध्यावन्दन में इसके चारों ओर एक सम्पूर्ण क्रिया — अघमर्षण — रची गई है, जिसमें उपासक जल हाथ में लेकर तथा ब्रह्माण्डीय नियम का चिन्तन करते हुए अशुद्धि का त्याग करता है। इस प्रकार यह गहन ब्रह्माण्डविद्या को दैनिक व्यावहारिक शुद्धि से जोड़ता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा से माना जाता है कि जो जल पर एकाग्र चित्त से, इसमें उद्घाटित ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का चिन्तन करते हुए अघमर्षण सूक्तम् का पाठ करता है, वह पाप से उतना ही निश्चित रूप से शुद्ध होता है मानो उसने महायज्ञ के अन्त में स्नान किया हो — शास्त्र इसकी शुद्धिकारक शक्ति की तुलना उस अवभृथ-स्नान से करते हैं जो किसी बड़े यज्ञ का समापन करता है। इतनी महान इसकी पवित्रता है कि यह संचित दुष्कर्म के निवारण हेतु द्विजों के नित्य सन्ध्या में बुना गया है।
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ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥१॥
Ṛtaṃ ca satyaṃ cābhīddhāttapaso'dhyajāyata | tato rātryajāyata tataḥ samudro arṇavaḥ ||1||
अर्थ:तेजोमय तप (सृष्टि की उष्णता एवं तपस्या) से ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) और सत्य उत्पन्न हुए; उससे रात्रि उत्पन्न हुई, और उससे तरंगित, गहन समुद्र (ब्रह्माण्डीय जल) उत्पन्न हुआ।
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ॥२॥
Samudrādarṇavādadhi saṃvatsaro ajāyata | ahorātrāṇi vidadhadviśvasya miṣato vaśī ||2||
अर्थ:उस तरंगित समुद्र से संवत्सर (वर्ष — काल का मान) उत्पन्न हुआ, जो दिन-रात का विधान करने वाला तथा समस्त चेतन (पलक झपकाने वाले) प्राणियों का स्वामी है।
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥३॥
Sūryācandramasau dhātā yathāpūrvamakalpayat | divaṃ ca pṛthivīṃ cāntarikṣamatho svaḥ ||3||
अर्थ:धाता (सृष्टिकर्ता) ने पूर्व कल्पों की भाँति सूर्य और चन्द्रमा की रचना की, तथा द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्लोक (प्रकाशमय लोक) की भी।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अघमर्षण सूक्तम् पाठ के लाभ
'अघमर्षण' — पाप को मिटाने वाला; इसके पाठ से संचित दुष्कर्म धुल जाने की मान्यता है
नित्य सन्ध्यावन्दन की क्रिया तथा स्नान (स्नान-कर्म) का एक प्रमुख मन्त्र
वैदिक परम्परा में प्रायश्चित्त (शुद्धि एवं पापमोचन का कर्म) रूप में प्रयुक्त
इसमें वर्णित ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) और सत्य का चिन्तन मन को शुद्ध करता है
वेद के गूढ़ सृष्टि-सूक्तों में से एक, जो ब्रह्माण्ड के सुव्यवस्थित प्रकटन को उद्घाटित करता है
धाता (सृष्टिकर्ता) तथा काल, सूर्य, चन्द्र और लोकों की लय का आवाहन करता है
आन्तरिक स्थिरता, पवित्रता और ब्रह्माण्डीय नियम के प्रति श्रद्धा लाता है
अघमर्षण सूक्तम् जप विधि
परम्परागत रूप से इसका पाठ सन्ध्यावन्दन के भीतर अघमर्षण-क्रिया के अंग के रूप में किया जाता है: उपासक अंजलि (दोनों हथेलियों) में जल लेता है, उसमें वर्णित ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का चिन्तन करते हुए तीनों मन्त्रों का पाठ करता है, और जल को बहा देता है — प्रतीकात्मक रूप से पाप को धोता हुआ। इसे नदी में खड़े होकर या स्नान-कर्म के समय भी जपा जाता है। ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) और सत्य पर ठहरते हुए, स्पष्ट वैदिक उच्चारण के साथ धीरे-धीरे पाठ करें। तीन बार पाठ, अथवा सन्ध्या में जैसा विहित हो, प्रथा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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