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अहं ब्रह्मास्मि — Word-by-Word Meaning

अहं ब्रह्मास्मि

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, परम सत्ता
वै
vai
वास्तव में, निश्चय ही
इदम् अग्रे आसीत्
idam agre āsīt
यह (जगत्) आदि में था
तत्
tat
वह (ब्रह्म)
आत्मानम् एव
ātmānam eva
अपनी आत्मा को ही
अवेत्
avet
जाना, अनुभव किया
अहम्
aham
मैं
ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, परम तत्त्व
अस्मि
asmi
हूँ
इति
iti
इस प्रकार (उसने जाना, 'मैं ब्रह्म हूँ')
तस्मात्
tasmāt
इसलिए, उस (अनुभूति) से
तत् सर्वम् अभवत्
tat sarvam abhavat
वह यह सब (सम्पूर्ण जगत्) बन गया
अहं ब्रह्मास्मि
aham brahmāsmi
'मैं ब्रह्म हूँ' — आत्मा को परम तत्त्व रूप में अनुभव करने वाला महावाक्य

Complete Translation

आदि में यह सब केवल ब्रह्म ही था। उसने अपनी आत्मा को ही जाना — 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ'। इसी कारण वह यह सम्पूर्ण जगत् बन गया। (देवताओं और मनुष्यों में जिसने भी इसे इसी प्रकार जाना, वह भी सर्वस्वरूप हो गया।)

Origin & History

Source: Brihadaranyaka Upanishad, Verse 1.4.10

Author: Traditional (Upanishadic)

Period: Vedic / Upanishadic

बृहदारण्यक उपनिषद् के प्रथम अध्याय में ऋषि आत्म-ज्ञान के उदय का वर्णन करते हैं: आदि में केवल ब्रह्म ही था, और अपनी आत्मा को जानकर उसने घोषणा की, 'अहं ब्रह्मास्मि — मैं ब्रह्म हूँ,' और इस प्रकार वह यह सब बन गया। आगे यह कहा गया है कि देवताओं, ऋषियों या मनुष्यों में जिसने भी इसी सत्य को जाना वह भी सर्वस्वरूप हो गया, जबकि जो दिव्य को पृथक् मानकर उपासना करते हैं वे सीमित ही रह जाते हैं। इस प्रकार यह परम उपदेश प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म का ज्ञाता स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।

Frequently Asked Questions

अहं ब्रह्मास्मि का क्या अर्थ है?
अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है 'मैं ब्रह्म हूँ'। यह वह अनुभूति है कि अन्तरतम आत्मा कोई सीमित व्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व के मूल अनन्त ब्रह्म के साथ अभिन्न है।
अहं ब्रह्मास्मि कहाँ से आता है?
यह शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10) से है, जो सबसे प्राचीन और विशाल उपनिषदों में से एक है। यह श्लोक वर्णन करता है कि ब्रह्म ने स्वयं को 'मैं ब्रह्म हूँ' रूप में जानकर समस्त अस्तित्व रूप धारण कर लिया।
क्या 'मैं ब्रह्म हूँ' कहना अहंकार है?
नहीं। यह अहंकार के विपरीत है। यहाँ 'मैं' शरीर-मन वाला व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह शुद्ध चेतना है जो परम तत्त्व के साथ एक है। इसकी अनुभूति छोटे अहंकार को पूर्णतः विलीन कर देती है और उसके स्थान पर अनन्त आत्मा को स्थापित कर देती है।
अध्यात्म-साधना में अहं ब्रह्मास्मि का प्रयोग कैसे होता है?
चार महावाक्यों में से एक के रूप में यह चिन्तन के लिए दिया जाता है। साधक श्रवण और मनन के पश्चात् इसकी सत्यता पर निदिध्यासन करता है जब तक 'मैं ब्रह्म हूँ' का प्रत्यक्ष ज्ञान जीवन्त अनुभव के रूप में उदित न हो, जो मोक्ष प्रदान करता है।

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