Mantra.Tips
aham-brahmasmimahavakyabrihadaranyaka-upanishadvedanta

अहं ब्रह्मास्मि

🕉️ upanishad·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में ध्यान और वेदान्त अध्ययन के समय·📜 Brihadaranyaka Upanishad, Verse 1.4.10

अन्य नाम / खोज: aham brahmasmi · aham brahma asmi · i am brahman · aham brahmosmi

Share:

अर्थ

अहं ब्रह्मास्मि अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ', बृहदारण्यक उपनिषद् (यजुर्वेद) का महावाक्य है और उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक है। यह घोषित करता है कि सच्ची आत्मा सीमित या पृथक् नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण जगत् के मूल अनन्त ब्रह्म के साथ अभिन्न है। अद्वैत वेदान्त में इसी अभेद-अनुभूति का ध्यान किया जाता है जो मोक्षदायी ज्ञान है।

उत्पत्ति और कथा

Brihadaranyaka Upanishad, Verse 1.4.10 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic

बृहदारण्यक उपनिषद् के प्रथम अध्याय में ऋषि आत्म-ज्ञान के उदय का वर्णन करते हैं: आदि में केवल ब्रह्म ही था, और अपनी आत्मा को जानकर उसने घोषणा की, 'अहं ब्रह्मास्मि — मैं ब्रह्म हूँ,' और इस प्रकार वह यह सब बन गया। आगे यह कहा गया है कि देवताओं, ऋषियों या मनुष्यों में जिसने भी इसी सत्य को जाना वह भी सर्वस्वरूप हो गया, जबकि जो दिव्य को पृथक् मानकर उपासना करते हैं वे सीमित ही रह जाते हैं। इस प्रकार यह परम उपदेश प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म का ज्ञाता स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा सिखाती है कि यह ज्ञान ही मनुष्य को निर्भय और अमर बना देता है — क्योंकि जो सचमुच 'मैं ब्रह्म हूँ' जानता है वह नाशवान शरीर से तादात्म्य नहीं करता, और इसलिए, जैसा उपनिषद् कहता है, 'देवता भी उस पर प्रबल नहीं हो सकते,' क्योंकि वह सबकी आत्मा ही बन गया है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् अहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्

brahma vā idam agra āsīt tad ātmānam evāvet aham brahmāsmīti, tasmāt tat sarvam abhavat

अर्थ:आदि में यह सब केवल ब्रह्म ही था। उसने अपनी आत्मा को ही जाना — 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ'। इसी कारण वह यह सम्पूर्ण जगत् बन गया। (देवताओं और मनुष्यों में जिसने भी इसे इसी प्रकार जाना, वह भी सर्वस्वरूप हो गया।)

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

ब्रह्म🔊brahmaब्रह्म, परम सत्ता
वै🔊vaiवास्तव में, निश्चय ही
इदम् अग्रे आसीत्🔊idam agre āsītयह (जगत्) आदि में था
तत्🔊tatवह (ब्रह्म)
आत्मानम् एव🔊ātmānam evaअपनी आत्मा को ही
अवेत्🔊avetजाना, अनुभव किया
अहम्🔊ahamमैं
ब्रह्म🔊brahmaब्रह्म, परम तत्त्व
अस्मि🔊asmiहूँ
इति🔊itiइस प्रकार (उसने जाना, 'मैं ब्रह्म हूँ')
तस्मात्🔊tasmātइसलिए, उस (अनुभूति) से
तत् सर्वम् अभवत्🔊tat sarvam abhavatवह यह सब (सम्पूर्ण जगत्) बन गया
अहं ब्रह्मास्मि🔊aham brahmāsmi'मैं ब्रह्म हूँ' — आत्मा को परम तत्त्व रूप में अनुभव करने वाला महावाक्य

अहं ब्रह्मास्मि पाठ के लाभ

उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक, आत्मा की ब्रह्म से अभिन्नता की मुख्य घोषणा।

गहन ध्यान (निदिध्यासन) में छोटे, पृथक्, मरणशील अहंकार के भाव को विलीन करने के लिए प्रयुक्त।

तैयार साधक के लिए आत्म-ज्ञान को जगाता है और मोक्ष प्रदान करता है।

सच्ची आत्मा की असीम प्रकृति को प्रकट करके भय, शोक और सीमा के भ्रम को दूर करता है।

मन को अटल शान्ति में स्थापित करता है — उस अनन्त की शान्ति जिसे कोई बाह्य वस्तु भंग नहीं कर सकती।

अद्वैत वेदान्त विचार का केन्द्र और अपनी गहनतम पहचान की पुष्टि के रूप में जपा जाता है।

अहं ब्रह्मास्मि जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में ध्यान और वेदान्त अध्ययन के समय
दिशाEast or North

यह अनुभूति का मन्त्र है, यान्त्रिक पुनरावृत्ति का नहीं। स्थिरता में बैठें, 'अहं ब्रह्मास्मि' को धीरे-धीरे कहें, और ध्यान को उस शुद्ध चेतना की ओर भीतर मोड़ें जो 'मैं हूँ' कहती है। चिन्तन करें कि यही चेतना — शरीर, मन और अहंकार से परे — स्वयं ब्रह्म है। इसे गुरु के सान्निध्य में वेदान्त के अध्ययन के पश्चात् करना श्रेष्ठ है, अर्थ पर तब तक मनन करते हुए जब तक पृथक्ता का भाव 'मैं समग्र हूँ' के ज्ञान में विलीन न हो जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है 'मैं ब्रह्म हूँ'। यह वह अनुभूति है कि अन्तरतम आत्मा कोई सीमित व्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व के मूल अनन्त ब्रह्म के साथ अभिन्न है।
यह शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10) से है, जो सबसे प्राचीन और विशाल उपनिषदों में से एक है। यह श्लोक वर्णन करता है कि ब्रह्म ने स्वयं को 'मैं ब्रह्म हूँ' रूप में जानकर समस्त अस्तित्व रूप धारण कर लिया।
नहीं। यह अहंकार के विपरीत है। यहाँ 'मैं' शरीर-मन वाला व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह शुद्ध चेतना है जो परम तत्त्व के साथ एक है। इसकी अनुभूति छोटे अहंकार को पूर्णतः विलीन कर देती है और उसके स्थान पर अनन्त आत्मा को स्थापित कर देती है।
चार महावाक्यों में से एक के रूप में यह चिन्तन के लिए दिया जाता है। साधक श्रवण और मनन के पश्चात् इसकी सत्यता पर निदिध्यासन करता है जब तक 'मैं ब्रह्म हूँ' का प्रत्यक्ष ज्ञान जीवन्त अनुभव के रूप में उदित न हो, जो मोक्ष प्रदान करता है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides