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अयम् आत्मा ब्रह्म

🕉️ upanishad·📿 11× जप·🕐 ब्रह्म मुहूर्त में, ध्यान और वेदान्त अध्ययन के समय प्रातःकाल·📜 Mandukya Upanishad, Verse 2

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अर्थ

अयम् आत्मा ब्रह्म अर्थात् 'यह आत्मा ही ब्रह्म है', माण्डूक्य उपनिषद् (अथर्ववेद) का महावाक्य है और उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक है। इसी प्रसंग में 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' (यह सब ब्रह्म है) तथा 'अयम् आत्मा ब्रह्म' दोनों कहे गए हैं, और फिर आत्मा की चार अवस्थाएँ — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — बताई गई हैं। सबसे छोटा होते हुए भी माण्डूक्य उपनिषद् ॐ और आत्मा के चिन्तन द्वारा मोक्ष का पूर्ण मार्गदर्शक माना जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Mandukya Upanishad, Verse 2 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic

माण्डूक्य उपनिषद् इस घोषणा से आरम्भ होता है कि ॐ अक्षर ही यह सब है, सम्पूर्ण भूत, वर्तमान और भविष्य, तथा जो कुछ कालातीत है। इसका दूसरा श्लोक प्रतिपादित करता है — 'यह सब निश्चय ही ब्रह्म है; यह आत्मा ही ब्रह्म है,' और घोषित करता है कि इस आत्मा के चार पाद हैं। फिर उपनिषद् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं तथा अन्ततः तुरीय — चौथी, मौन, अद्वैत आत्मा — का वर्णन करता है। इसकी शिक्षा इतनी सघन है कि परम्परा मानती है कि गौडपाद की कारिका सहित अकेले माण्डूक्य का अध्ययन ही मोक्ष प्रदान करने में समर्थ है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा में कहा गया है कि समस्त उपनिषदों में अकेला माण्डूक्य ही उत्सुक साधक की मुक्ति के लिए पर्याप्त है — क्योंकि 'यह आत्मा ही ब्रह्म है' घोषित कर और तुरीय को प्रकट कर, यह बारह श्लोकों में वह साक्षात् अनुभूति देता है कि समस्त अवस्थाओं का साक्षी आत्मा ही अमर परम सत्ता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

सर्वं ह्येतद् ब्रह्म अयम् आत्मा ब्रह्म सोऽयम् आत्मा चतुष्पात्

sarvaṁ hyetad brahma ayam ātmā brahma so'yam ātmā catuṣpāt

अर्थ:यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। यह आत्मा ही ब्रह्म है। यही आत्मा चार पादों (अवस्थाओं) वाली है — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय (चौथी अवस्था) जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप है और जिसका साक्षात्कार करना है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

सर्वम्🔊sarvamसब, सम्पूर्ण (समस्त जगत्)
हि🔊hiनिश्चय ही, वस्तुतः, क्योंकि
एतत्🔊etatयह
ब्रह्म🔊brahmaब्रह्म, परम सत्ता
अयम्🔊ayamयह (अन्तःस्थित आत्मा)
आत्मा🔊ātmāआत्मा, अन्तरात्मा
अयम् आत्मा ब्रह्म🔊ayam ātmā brahma'यह आत्मा ही ब्रह्म है' — वह महावाक्य जो अन्तरतम आत्मा को परम तत्त्व के साथ एक बताता है
सः अयम् आत्मा🔊saḥ ayam ātmāयही आत्मा
चतुष्पात्🔊catuṣpātचार पाद/अवस्थाओं वाली (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और चौथी तुरीय)
ओमित्येतदक्षरम्🔊om ityetad akṣaramॐ, यह अक्षर, यह सब है (उपनिषद् का प्रारम्भ, जो ॐ को ब्रह्म एवं आत्मा के साथ एक करता है)

अयम् आत्मा ब्रह्म पाठ के लाभ

उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक, जो अन्तरतम आत्मा को ब्रह्म घोषित करता है।

प्रकट करता है कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का साक्षी आत्मा ही अपरिवर्तनशील ब्रह्म (तुरीय) है।

ॐ और चेतना की चार अवस्थाओं पर ध्यान में प्रयुक्त होता है, जो साक्षात् आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

साधक को चौथी, सदा-मुक्त शुद्ध चैतन्य अवस्था में स्थापित कर मोक्ष प्रदान करता है।

आत्मा को समस्त अनुभव के पीछे मौन साक्षी के रूप में दिखाकर गहन शान्ति और वैराग्य देता है।

अद्वैत वेदान्त का आधार, माण्डूक्य उपनिषद् अकेला ही मोक्ष के लिए पर्याप्त माना जाता है।

अयम् आत्मा ब्रह्म जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयब्रह्म मुहूर्त में, ध्यान और वेदान्त अध्ययन के समय प्रातःकाल
दिशाEast or North

यह मन्त्र ॐ के ध्यान के साथ संयुक्त चिन्तन के लिए है। 'अयम् आत्मा ब्रह्म' का पाठ करें और फिर देखें कि वही 'मैं' जाग्रत में उपस्थित है, स्वप्न में बना रहता है, और स्वप्नरहित निद्रा में भी रहता है — फिर भी किसी से बँधा नहीं। इस साक्षी चेतना (तुरीय) को ब्रह्म, अपना यथार्थ स्वरूप पहचानें। इसे ॐ के धीमे उच्चारण के साथ जोड़ें, और मन को उस मौन में स्थिर होने दें जिससे ॐ उठता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अयम् आत्मा ब्रह्म का अर्थ है 'यह आत्मा ही ब्रह्म है'। यह सिखाता है कि आत्मा, आपके भीतर का यथार्थ स्वरूप, परम अनन्त सत्ता ब्रह्म से भिन्न नहीं है।
यह माण्डूक्य उपनिषद् (श्लोक २) से है, जो अथर्ववेद से सम्बन्धित है। माण्डूक्य सबसे छोटा उपनिषद् है, केवल बारह श्लोकों वाला, फिर भी इसे आत्मा और ॐ अक्षर पर एक पूर्ण शिक्षा माना जाता है।
आत्मा की चार अवस्थाएँ हैं: जाग्रत अवस्था (बाह्य जगत् का अनुभव), स्वप्न अवस्था (मन का आन्तरिक जगत्), सुषुप्ति (बिना विषयों के अभिन्न आनन्द) और तुरीय, चौथी — शुद्ध अद्वैत चैतन्य, जो यथार्थ आत्मा और ब्रह्म है।
माण्डूक्य ॐ की अ, उ, म ध्वनियों को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं से, तथा ॐ के पश्चात् के मौन को तुरीय से जोड़ता है। 'यह आत्मा ही ब्रह्म है' का चिन्तन करते हुए ॐ का ध्यान साधक को तीन अवस्थाओं से चौथी, मुक्तिदायक आत्म-अनुभूति की ओर ले जाता है।

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